जेलें उम्मीद, गरिमा या सुधार के अवसर को नहीं रोक सकतीं : न्यायमूर्ति सूर्यवंशी

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जेलें उम्मीद, गरिमा या सुधार के अवसर को नहीं रोक सकतीं : न्यायमूर्ति सूर्यवंशी

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  • Publish Date - September 19, 2026 / 08:05 PM IST,
    Updated On - September 19, 2026 / 08:05 PM IST

छत्रपति संभाजीनगर, 19 सितंबर (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ के न्यायाधीश नितिन सूर्यवंशी ने शनिवार को कहा कि किसी व्यक्ति की जिंदगी की एक गलती उसकी पूरी पहचान नहीं बन सकती और जेलें भले ही स्वतंत्रता को सीमित कर सकती हैं, लेकिन वे उम्मीद, गरिमा या नए जीवन की संभावना को खत्म नहीं कर सकतीं।

न्यायमूर्ति सूर्यवंशी ने हर्सुल स्थित छत्रपति संभाजीनगर केंद्रीय कारागार में आयोजित स्वास्थ्य जांच एवं जागरूकता शिविर का उद्घाटन किया।

इस अवसर पर उन्होंने कहा कि न्याय का अर्थ केवल सजा देना नहीं है, बल्कि इसमें मानव गरिमा की रक्षा भी शामिल है।

उन्होंने कहा, ‘‘कानून दोषसिद्धि या न्यायिक हिरासत के दौरान किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है, लेकिन वह व्यक्ति के स्वास्थ्य और गरिमा के अधिकार को नहीं छीन सकता।’’

न्यायमूर्ति सूर्यवंशी ने कहा, ‘‘कोई गलती किसी व्यक्ति के जीवन की एक घटना हो सकती है, लेकिन वह उसकी पूरी पहचान नहीं बन सकती।’’ उन्होंने कैदियों से सुधार की दिशा में आगे बढ़ने और समाज में जिम्मेदार नागरिक के रूप में लौटने के लिए खुद को तैयार करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि जेलों को केवल सजा देने वाली जगहों के रूप में नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास के संस्थानों के रूप में देखा जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति सूर्यवंशी ने कहा, ‘‘कैदियों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके मानसिक और सामाजिक कल्याण पर भी ध्यान देने की जरूरत है।’’

उन्होंने कहा कि समय पर चिकित्सा जांच से गंभीर बीमारियों का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है और निवारक स्वास्थ्य देखभाल, उपचार तथा परामर्श से कैदियों का जीवन अधिक सुरक्षित और स्वस्थ बनाया जा सकता है।

भाषा

शुभम सुरेश

सुरेश