प्रयागराज, पांच सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पर्याप्त साक्ष्य के बावजूद दहेज हत्या के आरोपी पति को “अधिकार का गलत और मनमाना उपयोग कर” जमानत पर रिहा करने के लिए जालौन के एक सत्र न्यायाधीश के खिलाफ जांच पर विचार करने का उच्च न्यायालय की प्रशासनिक समिति को निर्देश दिया है।
दहेज के कारण हुई मौत के मामलों में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 कानूनी अनुमान का प्रावधान करती है। इसके मुताबिक, जहां दहेज के लिए परिस्थितियों में एक महिला की मृत्यु होती है और यह प्रदर्शित होता है कि मृत्यु से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था तो अदालत यह मानकर चलेगी कि ऐसा व्यक्ति (आरोपी) ही दहेज के लिए मृत्यु का कारण बना।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने मृतका के पति की जमानत भी खारिज कर दी। यह आदेश अपर सत्र न्यायाधीश, जालौन के आदेश के खिलाफ जमानत निरस्त करने के आवेदन पर दिया गया।
अदालत ने आरोपी सतेन्द्र उर्फ सोनू को 10 दिनों के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
इस मामले के तथ्यों के मुताबिक, वर्ष 2025 में जिला जालौन के एक पुलिस थाने में बीएनएस की धारा 85 और 80(2) एवं दहेज रोधी कानून की धारा 3 और 4 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। बाद में जिला अदालत द्वारा पति को जमानत दे दी गई।
उच्च न्यायालय में जमानत रद्द करने की मांग करते हुए यह दलील दी गई कि महिला की मौत शादी से सात साल के भीतर कथित तौर पर फांसी लगाने से संदिग्ध परिस्थितियों में हो गई। मौत से पहले महिला के साथ दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर क्रूरता की गई थी। इसके बावजूद, पति को जमानत दे दी गई।
इन परिस्थितियों का संज्ञान लेते हुए उच्च न्यायालय ने इससे पूर्व अपर सत्र न्यायाधीश को यह बताने को कहा था कि बिना कारण बताए और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के अनुमान के उलट उन्होंने कैसे जमानत दे दी।
अपर सत्र न्यायाधीश सतीश चंद्र द्विवेदी ने अपने स्पष्टीकरण में स्वीकार किया कि दहेज की मांग की वजह से आरोपी के खिलाफ उत्पीड़न के साक्ष्य थे।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत अनुमान लागू होता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि सास और ससुर के साथ समानता के आधार पर जमानत प्रदान की गई।
न्यायमूर्ति देशवाल ने एक सितंबर को दिए अपने निर्णय में कहा, “यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि जमानत देने के विवेकाधिकार का इस्तेमाल मनमाने ढंग से किया गया। इससे इस विवेकाधिकार के उपयोग में संदेह पैदा होता है।”
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि वह संबंधित न्यायाधीश की निष्ठा को लेकर कोई विचार प्रकट नहीं कर रही है। हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर इसकी जांच करने की जरूरत है।
भाषा सं राजेंद्र शफीक
शफीक