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वडोदरा, 23 मार्च (भाषा) कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आदिवासियों के लिए वनवासी शब्द के इस्तेमाल को लेकर सोमवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर निशाना साधा तथा दावा किया कि उन्होंने इस शब्द को इसलिए गढ़ा है, ताकि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों के मूल स्वामित्व को नकारा जा सके, जो सदियों से उन्हीं का है।
वडोदरा में आयोजित आदिवासी अधिकार संविधान सम्मेलन को संबोधित करते हुए गांधी ने जाति जनगणना की अपनी मांग को दोहराया, जिसे उन्होंने आदिवासियों के लिए देश की सत्ता और संपदा में अपना हिस्सा पाने के लिए महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी निशाना साधा और आरोप लगाया कि इस समझौते के तहत कृषि क्षेत्र को उस देश के लिए खोल दिया गया है, ऐसा पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया था।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘आदिवासी से तात्पर्य भारत के मूल निवासियों से है। यदि आप इस भूमि पर 1,000, 2,000 या यहां तक कि 5,000 वर्ष पहले भी आते, तो आप पाते कि जमीन का एक-एक इंच आदिवासियों के हाथों में था।’’
उन्होंने कहा “अब, 21वीं सदी में एक नया शब्द सामने आया है– आरएसएस और भाजपा द्वारा गढ़ा गया एक शब्द वनवासी। वनवासी शब्द का तात्पर्य है कि आप इस भूमि के मूल स्वामी नहीं थे। दूसरी ओर, आदिवासी शब्द का अर्थ है कि यह देश आपका था, इसका जल, जंगल और जमीन सही मायने में आपकी थी।”
गांधी ने कहा कि आदिवासियों को वनवासी कहना संविधान और पूज्य आदिवासी नेता बिरसा मुंडा पर हमला है। कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘वनवासी शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि आप मूल स्वामी नहीं थे- बल्कि मूल स्वामी कोई और था और जल, जंगल एवं जमीन आपकी नहीं थी; आप केवल संयोगवश वन में निवास करते थे।’
विपक्ष के नेता ने कहा, ‘‘जैसा कि किसी ने सही कहा है, हम संविधान के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसमें हजारों साल पुराना दर्शन समाहित है। मोदी समेत भाजपा के सदस्य बिरसा मुंडा, आंबेडकर, फुले और गांधी की प्रतिमाओं के समक्ष नमन करते हैं; फिर भी वे उन सिद्धांतों की रक्षा करने में विफल रहते हैं जिनका बिरसा मुंडा ने समर्थन किया और उस उद्देश्य की रक्षा करने में भी विफल रहते हैं जिसके लिए उन्होंने अपना प्राणों का बलिदान दिया।’’
गांधी ने कहा कि संविधान में बिरसा मुंडा की आवाज समाहित है, और जब भाजपा आदिवासियों को वनवासी कहकर इस आवाज पर हमला करती है और उनके जल, जंगल और जमीन को कारोबारी घरानों को सौंप देती है, तो वह पार्टी केवल संविधान पर ही हमला नहीं कर रही, बल्कि वह बिरसा मुंडा पर हमला कर रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘जब भी विकास का विषय उठता है, अक्सर बिना मुआवजा दिए आदिवासियों की जमीन छीन ली जाती है, क्योंकि आपको किसी भी प्रकार का कोई अधिकार या हक नहीं है।’’
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर गांधी ने कहा, ‘भारत के इतिहास में किसी भी प्रधानमंत्री ने कृषि क्षेत्र को इतना नहीं खोला। इसके पीछे एक कारण है। हमारे खेत छोटे हैं, 5 से 10 एकड़ के बीच। अमेरिका में खेत 1,000, 5,000 या 10,000 एकड़ तक फैले हुए हैं। यहां लोग हाथों से काम करते हैं और मशीनीकरण सीमित है; वहां सब कुछ पूरी तरह से मशीनीकृत है।’
गांधी ने कहा कि अगर उनके उत्पाद भारत के बाजारों में भर जाएं तो देश के किसान पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे। कांग्रेस नेता ने कहा कि भारत ने दालों, सोयाबीन, फलों और कपास समेत अन्य उत्पादों के लिए बाजार खोल दिए हैं और देश अगले पांच वर्षों में अमेरिका से नौ लाख करोड़ रुपये का सामान खरीदने के लिए तैयार है।
उन्होंने कहा, ‘‘अगर हम अमेरिकी कंपनियों से नौ लाख करोड़ रुपये का सामान खरीदते हैं, तो हमारी अपनी कंपनियों का क्या होगा? हमारे लघु एवं मध्यम उद्यमों का क्या होगा? उन्होंने अमेरिकी उत्पादों पर कर घटाकर शून्य कर दिया है, जबकि साथ ही साथ हमारे घरेलू उत्पादों पर कर बढ़ा दिया है।”
गांधी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री दबाव में हैं।
गांधी ने यह भी कहा कि जब वह जाति जनगणना के बारे में बोलते हैं तो भाजपा और आरएसएस उन पर हमला करते हैं। उन्होंने कहा, “जाति जनगणना का असल मतलब क्या है?…जाति जनगणना का अर्थ है आदिवासियों की वास्तविक आबादी का पता लगाना और नौकरशाही तथा कॉरपोरेट सेक्टर सहित देश की संस्थाओं में उनके अनुपातिक हिस्से को निर्धारित करना।’’
गांधी ने कहा कि आदिवासी आबादी का 9 प्रतिशत, दलित 15 प्रतिशत और पिछड़े वर्ग 50 प्रतिशत हैं।
उन्होंने कहा, ‘क्या आपको सचमुच लगता है कि इस देश में आदिवासियों की हिस्सेदारी वर्तमान में 10 प्रतिशत है? भाषण लंबे होते हैं, लोग बिरसा मुंडा की प्रतिमा के सामने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ते हैं, फिर भी, जब वास्तव में लोगों को सशक्त बनाने या देश की संपत्ति वितरित करने का समय आता है, तो वे पूरी तरह से चुप हो जाते हैं।’
गांधी ने आदिवासियों के लिए एक घोषणापत्र की आवश्यकता पर सहमति जताई। उन्होंने कहा, ‘‘हम गुजरात समेत देश में आदिवासियों के लिए इन विशेष कार्यों को पूरा करने का इरादा रखते हैं, और जब तक इनके क्रियान्वयन को सुनिश्चित नहीं कर लेते, तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘आदिवासियों को उन संस्थाओं पर नियंत्रण हासिल करना होगा जिन पर आज आरएसएस ने कब्जा कर लिया है। जब तक आपके अपने लोग नौकरशाही, पुलिस बल और न्यायपालिका में प्रवेश नहीं कर लेते, तब तक आपके हितों की पूर्ति नहीं होगी। संविधान आपका रक्षक है, फिर भी ये ताकतें इसे ध्वस्त करने पर तुली हुई हैं।’’
भाषा आशीष नरेश
नरेश