जोधपुर, 25 अगस्त (भाषा) राजस्थान उच्च न्यायालय ने स्कूल कैंटीन और स्कूल द्वार के 50 मीटर के दायरे में शीतल पेय, चिप्स और अन्य ‘जंक फूड’ की बिक्री पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही, अदालत ने संतुलित भोजन और पोषण को लेकर कई निर्देश जारी किए तथा प्रश्नपत्र लीक, (टीवी/कंप्यूटर/मोबाइल) स्क्रीन के सामने ज़्यादा समय बिताने और ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी पर चिंता जताई।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढांड की जोधपुर पीठ ने ‘जेन जी’, ‘जेन अल्फा’ और ‘जेन बीटा’ पीढ़ी के बच्चों से संबंधित बुनियादी संस्थानों में ‘‘प्रणाली की कमियों’’ का स्वतः संज्ञान लेते हुए सभी स्कूलों को निर्देश दिया कि वे एक खाद्य सुरक्षा और पोषण समिति बनाएं, कैंटीन में व्यंजन सूची लगाएं जिन पर कैलोरी की मात्रा, सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी हो, तथा यह सुनिश्चित करें कि मध्याह्न भोजन संतुलित आहार के दिशा-निर्देशों के अनुसार हो।
जेन जी से तात्पर्य 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी, जेन अल्फा से आशय 2010 से 2025 के बीच पैदा हुए बच्चों और जेल बीटा से मतलब 2025 से 2039 के बीच पैदा होने वाली पीढ़ी से है।
उच्च न्यायालय सोमवार को केंद्रीय शिक्षा और मानव संसाधन सचिव, केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, राजस्थान के मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव (शिक्षा), सचिव (खाद्य और नागरिक आपूर्ति), भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और राजस्थान राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग को नोटिस जारी किया, तथा आठ सप्ताह के भीतर जवाब मांगा।
इसने अपने आदेश में कहा, ‘‘यह अदालत इस बात को लेकर बहुत चिंतित है कि एक तरफ तो देश ‘जेन जी’, ‘जेन अल्फा’ और ‘जेन बीटा’ को 2047 (देश की आज़ादी के 100 साल) और उसके बाद भारत का नेतृत्व करने के लिए तैयार कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें संवारने वाले बुनियादी संस्थान, खासकर ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूल, लगातार प्रणाली की कमियों से जूझ रहे हैं।’’
आदेश में कहा गया, ‘‘संक्षेप में, ये तीन पीढ़ियां ही आने वाले समय में देश का नेतृत्व करेंगी।’’
उच्च न्यायालय ने स्कूल कैंटीन और स्कूल द्वार के 50 मीटर के दायरे में वसा, शर्करा और नमक की अधिक मात्रा वाली खाद्य वस्तुओं की बिक्री पर रोक लगा दी। जिन चीज़ों पर रोक लगाई गई है, उनमें कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, चिप्स, ट्रांस-फैट वाले बेकरी उत्पाद और दूसरे जंक फ़ूड शामिल हैं।
अदालत ने हर स्कूल को निर्देश दिया कि वे चार हफ़्ते के भीतर स्कूल खाद्य सुरक्षा और पोषण समिति का गठन करें, जिसमें शिक्षक, अभिभावक और छात्र प्रतिनिधि शामिल हों। समितियों की जानकारी शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी।
आठ सप्ताह के अंदर, स्कूल कैंटीन के लिए यह ज़रूरी है कि वे ऐसी व्यंजन सूची लगाएं जिनमें खाने की चीज़ों की कैलोरी, उनमें इस्तेमाल हुई सामग्री और पोषण महत्व की जानकारी हो, और साथ ही ‘ट्रैफ़िक-लाइट लेबलिंग’ प्रणाली भी लागू करनी होगी।
‘ट्रैफिक लाइट लेबलिंग’ रंगों के संकेतक वाली पोषण प्रणाली है जो लाल, पीले और हरे रंग का उपयोग करके एक नजर में यह दर्शाती है कि किसी खाद्य पदार्थ में वसा, संतृप्त वसा, शर्करा और नमक की मात्रा अधिक, मध्यम या कम है।
राज्य सरकार से कहा गया कि वह छह हफ़्ते के अंदर हलफ़नामा दाखिल करे, जिसमें सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में सुरक्षित एवं संतुलित भोजन से जुड़े 2020 के नियमों को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी हो।
अदालत ने निर्देश दिया कि मध्याह्न भोजन और पोषण से जुड़ी अन्य योजनाएं भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के संतुलित आहार संबंधी दिशानिर्देशों के अनुरूप हों, और साथ ही खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों के लिए एक समर्पित पोर्टल और हेल्पलाइन भी बनाई जाए।
पीठ ने बच्चों में ‘मोबाइल स्क्रीन टाइम’ बढ़ने और प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर चिंता जताई।
यह मानते हुए कि छात्रों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने में एआई और ‘डिजिटल लर्निंग’ ज़रूरी हैं, इसने आगाह किया कि प्रौद्योगिकी बुनियादी रूप से सीखने के कौशल का विकल्प नहीं बननी चाहिए।
अदालत ने ‘डिजिटल लर्निंग’ और सीखने के पारंपरिक तरीकों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए, हाथ से लिखने, किताबें पढ़ने, नोट्स बनाने, स्वतंत्र रूप से सोचने और लिखित परीक्षाओं को बनाए रखने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
पीठ ने बार-बार प्रश्नपत्र लीक होने पर भी चिंता जताई और कहा कि इससे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई-लिखाई की योजना पर बुरा असर पड़ता है, साथ ही परीक्षा व्यवस्था में लोगों का भरोसा भी कम होता है।
इसने प्रश्नपत्र लीक को रोकने के लिए पूरी तरह त्रुटिरहित व्यवस्था का आह्वान किया।
अदालत ने अधिकारियों को ग्रामीण और दूर-दराज के सरकारी स्कूलों में कमियों को दूर करने का निर्देश दिया, जिनमें शिक्षकों के खाली पद, स्मार्ट कक्षाएं, कंप्यूटर, इंटरनेट कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य जांच, शौचालय, पीने का पानी और खेल-कूद की सुविधाएं शामिल हैं।
इसके अलावा, इसने केंद्र और राज्य सरकारों से ‘जेन ज़ी’ से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए एक योजना तैयार करने को कहा। इन चुनौतियों में शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर, गिग श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा, किफायती हॉस्टल और आवास, ‘डिजिटल डिटॉक्स’ कार्यक्रम, डेटा निजता और साइबर सुरक्षा शामिल हैं।
तीन पीढ़ियों को प्रभावित करने वाले मुद्दों की पड़ताल में अदालत की सहायता के लिए वकीलों को न्याय-मित्र के तौर पर नियुक्त किया गया है।
मामले को उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने के लिए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है।
भाषा
नेत्रपाल माधव
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