राजस्थान : स्याहगोश के आवास, व्यवहार पर अध्ययन के लिए ‘प्रोजेक्ट कैराकल’ शुरू किया गया

राजस्थान : स्याहगोश के आवास, व्यवहार पर अध्ययन के लिए ‘प्रोजेक्ट कैराकल’ शुरू किया गया

राजस्थान : स्याहगोश के आवास, व्यवहार पर अध्ययन के लिए ‘प्रोजेक्ट कैराकल’ शुरू किया गया
Modified Date: June 3, 2026 / 05:01 pm IST
Published Date: June 3, 2026 5:01 pm IST

जयपुर, तीन जून (भाषा) राजस्थान सरकार ने जंगली बिल्ली की बेहद दुर्लभ नस्ल स्याहगोश (कैराकल) के आवास, खानपान, व्यवहार और अस्तित्व संबंधी खतरों का अध्ययन करने तथा राज्य में उसके संरक्षण की नीति तैयार करने के लिए ‘प्रोजेक्ट कैराकल’ शुरू किया है।

सलीम अली पक्षी विज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र (एसएसीओएन), भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई), राजस्थान वन विभाग और एनजीओ ‘टाइगर वॉच’ के विशेषज्ञ संयुक्त रूप से 18 महीने लंबी इस परियोजना को कार्यान्वित कर रहे हैं।

डब्ल्यूआईआई के निदेशक डॉ. गोविंद सागर भारद्वाज ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि ‘प्रोजेक्ट कैराकल’ के तहत राजस्थान के चार बाघ अभयारण्यों-रणथंभौर (सवाई माधोपुर), धौलपुर-करौली, रामगढ़ विषधारी (बूंदी) और मुकुंदरा (कोटा) के साथ-साथ बंधबरेठा जैसे आसपास के क्षेत्रों में स्याहगोश पर विस्तृत अध्ययन किया जाएगा।

उन्होंने कहा, “अध्ययन के दौरान स्याहगोश की आदतों, खानपान, आवास और अस्तित्व के समक्ष मौजूद खतरों का विश्लेषण किया जाएगा। अध्ययन में मिले निष्कर्षों के आधार पर स्याहगोश के संरक्षण की नीति बनाई जाएगी।”

भारद्वाज ने कहा कि स्याहगोश भारत के अर्ध-शुष्क सवाना क्षेत्रों में पाई जानी वाली बेहद फुर्तीली दुर्लभ जंगली बिल्ली है और राजस्थान तथा गुजरात इसके प्रमुख निवास स्थान हैं, लेकिन भूमि उपयोग में तेजी से हो रहे बदलाव और बढ़ती मानवीय गतिविधियों के चलते इसका अस्तित्व खतरे में है।

उन्होंने बताया कि भारत में फिलहाल 100 से भी कम स्याहगोश होने का अनुमान है।

अधिकारियों के मुताबिक, कुछ समय पहले शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट कैराकल’ के तहत कार्यशालाओं और शैक्षिक सामग्री के माध्यम से स्कूली छात्रों, शिक्षकों और स्थानीय समुदायों में जागरूकता पैदा करने पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि ‘कैमरा ट्रैप’ और फील्ड सर्वेक्षण के माध्यम से स्याहगोश और उसके आवास के बारे में अतिरिक्त डेटा जुटाया जाएगा।

वन विभाग के मुताबिक, स्याहगोश की मौजूदगी, आवाजाही के तरीके और निवास संबंधी प्राथमिकताओं का आकलन करने के लिए विभिन्न जगहों पर ‘कैमरा ट्रैप’ लगाए जाएंगे।

‘कैमरा ट्रैप’ मोशन सेंसर से लैस स्वचालित कैमरे को कहते हैं, जो अपने आसपास किसी जानवर या व्यक्ति की मौजूदगी या हलचल का संकेत मिलते ही खुद बखुद सक्रिय हो जाता है।

विभाग ने बताया कि शोधकर्ता निवास स्थान में बदलाव के असर और तेंदुए तथा बाघ जैसे अन्य शिकारी जीवों के साथ प्रतिस्पर्धा या संघर्ष की संभावनाओं का भी विश्लेषण करेंगे।

रणथंभौर बाघ अभयारण्य के उप वन संरक्षक मानस सिंह ने कहा कि यह परियोजना न केवल स्याहगोश के संरक्षण संबंधी उपायों को मजबूत करेगी, बल्कि रणथंभौर क्षेत्र में जैव विविधता संरक्षण को एक नयी रफ्तार भी प्रदान करेगी।

अध्ययन दल में शामिल डॉ. धर्मेंद्र खांडल ने कहा कि इस परियोजना से स्याहगोश के लिए एक व्यापक संरक्षण रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी।

‘प्रोजेक्ट कैराकल’ के तहत सर्वेक्षण और डेटा विश्लेषण के लिए वरिष्ठ शोधकर्ताओं और प्रशिक्षित फील्ड कर्मचारियों को तैनात किया गया है। इस परियोजना में संभावित वन्यजीव गलियारों और आवासों का मानचित्रण भी किया जाएगा।

खांडल ने बताया कि पिछले दो दशक में स्याहगोश मुख्य रूप से गुजरात के भुज, मध्यप्रदेश के भिंड-मुरैना और राजस्थान के धौलपुर, करौली, भरतपुर तथा सवाई माधोपुर में ही दिखाई दिए हैं।

उन्होंने बताया कि हाल के समय में रामगढ़ विषधारी बाघ अभयारण्य, मुकुंदरा हिल्स, सरमथुरा डांग क्षेत्र (धौलपुर-करौली), बंधबरेठा और रामगढ़ (जैसलमेर) में भी स्याहगोश को देखे जाने की सूचना मिली है।

वन विभाग के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की लाल सूची में शामिल स्याहगोश एक बेहद फुर्तीली निशाचर जंगली बिल्ली है, जो पक्षियों को पकड़ने के लिए हवा में 10-12 फुट तक छलांग लगाने में सक्षम है।

विभाग के अनुसार, यह नस्ल भारत में अपने पूर्व निवास क्षेत्र के लगभग 95 प्रतिशत हिस्से से विलुप्त हो चुकी है और अब मुख्य रूप से राजस्थान के कुछ हिस्सों तथा गुजरात के कच्छ क्षेत्र तक ही सीमित है।

भाषा

बाकोलिया पारुल

पारुल


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