नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) राज्यसभा में बुधवार को सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के सांसदों ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026 की सराहना की और इसे लंबे समय से प्रतीक्षित सुधार बताया, जबकि विपक्ष ने इसे ‘‘भेदभावपूर्ण’’ और ‘‘संस्थागत स्वायत्तता के लिए खतरा’’ करार दिया।
विधेयक पर चर्चा के दौरान भाजपा सांसदों ने कहा कि यह कानून सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ और आईटीबीपी जैसे अर्धसैनिक बलों में आवश्यक समानता लाएगा।
मनोनीत सदस्य गुलाम अली ने कहा कि समान रैंक और सेवा रिकॉर्ड वाले कर्मियों की पदोन्नति को लेकर असमानताएं ‘‘काडर में असंतोष’’ पैदा कर रही थीं, और यह विधेयक इन विसंगतियों को दूर करेगा।
उन्होंने बलों के बीच बेहतर सूचना-साझा करने और समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया और कहा कि पंजाब और जम्मू-कश्मीर में पूर्व में हुई चूकें समुचित संवाद के अभाव के कारण बढ़ गई थीं। उन्होंने कहा कि विधेयक लगभग ‘‘एक राष्ट्र, एक सीएपीएफ’’ बनाएगा।
भाजपा के अजीत माधवराव गोपछड़े ने कहा कि मोदी सरकार के तहत वामपंथी उग्रवाद के मामलों में कमी आई है और सीएपीएफ तथा राज्य पुलिस के बीच बेहतर समन्वय के कारण सुरक्षा में सुधार हुआ है। उन्होंने कहा कि विरोध करने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा की तुलना में राजनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं।
भाजपा के मयंक कुमार नायक ने विधेयक को सीएपीएफ के आधुनिकीकरण की दिशा में कदम बताया और कहा कि अलग-अलग नियमों के कारण पदोन्नति और मुकदमों में भ्रम पैदा हुआ। उन्होंने 2010 के दंतेवाड़ा हमले का उल्लेख किया, जिसमें 76 जवान मारे गए, और कहा कि पूर्व सरकारों के दौरान एकीकृत कमांड की कमी महंगी साबित हुई।
भाजपा के बृजलाल ने 1980 का एक उदाहरण देते हुए कहा कि तत्कालीन सीबीआई निदेशक से ‘‘युवराज’’ ने शाह आयोग की रिपोर्ट मांगी थी, जिसे निदेशक ने देने से इनकार कर दिया था। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस आरोप को प्रमाणित करने को कहा।
विपक्षी सदस्यों ने विधेयक की कड़ी आलोचना की तथा इसे प्रवर समिति में भेजने पर जोर दिया।
तृणमूल कांग्रेस के साकेत गोखले ने कहा कि यह विधेयक आईपीएसद अधिकारियों को सीएपीएफ में नेतृत्व पदों पर वर्चस्व देने वाला प्रणालीगत बदलाव है, जो काडर अधिकारियों की पदोन्नति को प्रभावित करेगा। उन्होंने कर्मियों की कठिन परिस्थितियों और सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने के दौरान सुविधाओं की कमी का जिक्र किया।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की डॉ फौजिया खान ने विधेयक को ‘‘कानून के बहाने न्यायिक बचाव’’ करार दिया और कहा कि यह विविध बलों पर ‘‘एक केंद्रीय कानून’’ थोपकर राष्ट्रीय सुरक्षा कमजोर करेगा। उन्होंने लंबित पदोन्नति और सीएपीएफ कर्मियों के व्यापक परामर्श की मांग की।
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026 पर चर्चा में भाजपा के नरेश बंसल, मनन कुमार मिश्रा, धर्मशीला गुप्ता, रेखा शर्मा, डॉ परमार जसवंतसिंह सालमसिंह, सतपाल शर्मा, रामभाई मोकारिया, और शिवसेना (उबाठा) की प्रियंका चतुर्वेदी ने भी हिस्सा लिया।
विधेयक सीएपीएफ के प्रशासन, सेवा शर्तों और संचालन समन्वय के लिए एक समान कानूनी ढांचा प्रदान करने का प्रयास करता है। वर्तमान में, सभी सीएपीएफ… सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी — अपने-अपने अधिनियमों द्वारा संचालित होते हैं।
विधेयक के अनुसार आईपीएस अधिकारियों को सीएपीएफ में नियुक्त करने के लिए, महानिरीक्षक के पद के 50 प्रतिशत और अतिरिक्त महानिदेशक के पद के न्यूनतम 67 प्रतिशत पद प्रतिनियुक्ति के माध्यम से भरे जाएंगे।
यह प्रस्तावित कानून उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद आया है, जिसने अक्टूबर 2025 में केंद्र की अपील खारिज कर दी थी।
भाषा मनीषा माधव
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