रिताब्रता बनर्जी : ममता में लेनिन की झलक देखने से लेकर उनके खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व करने तक

रिताब्रता बनर्जी : ममता में लेनिन की झलक देखने से लेकर उनके खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व करने तक

रिताब्रता बनर्जी : ममता में लेनिन की झलक देखने से लेकर उनके खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व करने तक
Modified Date: June 3, 2026 / 06:47 pm IST
Published Date: June 3, 2026 6:47 pm IST

कोलकाता, तीन जून (भाषा) रिताब्रता बनर्जी कुछ समय पहले तक ममता बनर्जी में रूसी क्रांति के नायक व्लादिमीर लेनिन की झलक देखते थे। लेकिन आज, रिताब्रता उसी नेता के खिलाफ ‘‘विद्रोह’’ का नेतृत्व कर रहे हैं, जिन्हें उन्होंने कभी जनहितैषी राजनीति का प्रतीक बताया था।

तृणमूल कांग्रेस के 58 बागी विधायकों ने निष्कासित विधायक रिताब्रता बनर्जी को विधायक दल का नेता चुना और बुधवार को अपने इस फैसले की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस को दी।

माकपा राज्यसभा सदस्य रह चुके 46 वर्षीय रिताब्रता ने पूर्व में कहा था कि उन्होंने ममता बनर्जी को लाखों लोगों के बीच काम करते हुए देखकर जनहितैषी राजनीति पर लेनिन के प्रसिद्ध कथन को समझा, अब वह खुद तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में पार्टी में सबसे बड़े आंतरिक विद्रोह का नेतृत्व कर रहे हैं।

रिताब्रता की तुलना महाराष्ट्र के नेता एकनाथ शिंदे से की जा रही है, जिनके विद्रोह के कारण तत्कालीन शिवसेना में विभाजन हुआ था।

एक अनुभवी राजनीतिक विश्लेषक ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, ‘‘शायद ये (रिताब्रता) बंगाल के इकलौते प्रमुख नेता हैं जिन्हें माकपा और तृणमूल, दोनों ने निष्कासित किया है।’’

धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने और टेलीविजन पर राजनीतिक बहसों में अलग पहचान बनाने वाले रिताब्रता ने 2008 में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के महासचिव के रूप में पहली बार प्रसिद्धि हासिल की और ममता बनर्जी के सत्ता में आने के दौरान वामपंथी युवा शाखा के सबसे मशहूर चेहरों में से एक बन गये।

वर्ष 2011 में, जब वाम मोर्चा लगभग तीन दशकों की सत्ता के बाद सबसे मुश्किल चुनाव का सामना कर रहा था, तब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने कोलकाता दक्षिण लोकसभा उपचुनाव में टीएमसी के दिग्गज नेता सुब्रत बख्शी के खिलाफ रिताब्रता को मैदान में उतारा, लेकिन वह हार गए।

तीन साल बाद, बंगाल के हाल के इतिहास में सबसे कड़े मुकाबले वाले राज्यसभा चुनावों में से एक में, माकपा ने रिताब्रता को संसद के ऊपरी सदन में भेजा।

महज 35 साल की उम्र में उनकी पदोन्नति ने पश्चिम बंगाल माकपा मुख्यालय में हलचल मचा दी।

कई वरिष्ठ नेता इस कदम से खुश नहीं थे। फिर भी, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य इस प्रतिभाशाली युवा नेता के साथ मजबूती से खड़े रहे। रिताब्रता को पूर्व माकपा महासचिव सीताराम येचुरी का भी करीबी माना जाता था।

हालांकि, पार्टी और रिताब्रता के बीच संबंध जल्द ही खराब हो गए। पार्टी के सहयोगियों द्वारा एक वामपंथी नेता की विलासितापूर्ण जीवनशैली पर सवाल उठाए गए, जबकि पार्टी सादगीपूर्ण राजनीति पर गर्व करती थी।

वर्ष 2017 में, रिताब्रता को पहले निलंबित किया गया और बाद में माकपा से निष्कासित कर दिया गया।

रिताब्रता का राजनीतिक निर्वासन अल्पकालिक ही रहा। इस दौरान, वह मुकुल रॉय और कैलाश विजयवर्गीय जैसे भाजपा नेताओं के करीबी बताए जाते थे।

हालांकि, एक महिला से जुड़े पुलिस मामले के बाद, उन्होंने अपना रुख बदल लिया और तृणमूल के समर्थक मंचों पर दिखाई देने लगे।

वर्ष 2020 तक, राज्यसभा में अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद रिताब्रता औपचारिक रूप से तृणमूल में शामिल हो गए।

भाषा शफीक माधव

माधव


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