विभाजन के दौरान आरएसएस को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा गया : आंबेकर

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विभाजन के दौरान आरएसएस को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा गया : आंबेकर

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  • Publish Date - May 22, 2026 / 09:03 PM IST,
    Updated On - May 22, 2026 / 09:03 PM IST

नयी दिल्ली, 22 मई (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पदाधिकारी सुनील आंबेकर ने शुक्रवार को दावा किया कि संगठन पर पहली बार प्रतिबंध इसलिए लगाया गया था क्योंकि राजनीतिक हलकों में विभाजन के दौरान आरएसएस के बढ़ते जनसमर्थन को ‘‘राजनीतिक प्रतिस्पर्धा’’ के रूप में देखा जा रहा था।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि उस समय संघ अधिक मजबूत होता तो भारत का विभाजन ‘‘शायद नहीं हुआ होता।’’

आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अंबेकर यहां संगठन के मुख्यालय केशव कुंज में एक समारोह को संबोधित कर रहे थे, जिसमें ‘‘दिल्ली में संघ यात्रा’’ नामक वृत्तचित्र जारी किया गया।

महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में आरएसएस पर लगाए गए पहले प्रतिबंध का उल्लेख करते हुए अंबेकर ने दावा किया कि यह फैसला संघ के बढ़ते सामाजिक प्रभाव के कारण उत्पन्न ‘‘राजनीतिक प्रतिस्पर्धा’’ से जुड़ा था।

उन्होंने कहा, ‘‘आज इतने वर्षों बाद इन सब बातों को निष्पक्ष दृष्टि से देखना बेहद जरूरी है।’’

आंबेकर ने कहा, ‘‘समझने की बात यह है कि यदि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार राजनीति करना चाहते, तो वे सीधे एक राजनीतिक दल बना सकते थे। लेकिन उनका उद्देश्य समाज को सांस्कृतिक रूप से जागृत करना था और इसलिए उन्होंने आरएसएस की स्थापना की। लक्ष्य सामाजिक उत्थान था-समाज को मजबूत बनाना और देश को अपनी शक्ति पर आत्मविश्वास से खड़ा करना।”

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन शायद राजनीति में इसे स्वीकार नहीं किया गया। जैसा अक्सर होता है, देश के विभाजन के बाद विभाजन के जिम्मेदार लोगों को उस समय खलनायक के रूप में देखा जा रहा था। दूसरी ओर, समाज की मदद करने और लोगों की सेवा करने वाले आरएसएस कार्यकर्ताओं के काम की सराहना हो रही थी।’’

आंबेकर ने कहा, ‘‘संघ तो केवल अपना काम कर रहा था, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे लोकप्रियता हासिल करने और प्रतिस्पर्धी चुनौती के रूप में देखा जाने लगा। परिणामस्वरूप स्थिति का फायदा उठाकर संघ पर पहला प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन अंततः सत्य की जीत हुई। संघ ने लोकतांत्रिक और अहिंसक तरीके से इसका विरोध किया और आखिरकार प्रतिबंध हटा लिया गया।’’

स्वतंत्रता और विभाजन के दौर को याद करते हुए आंबेकर ने कहा कि 1942 से 1946 के बीच दिल्ली और पूरे उत्तर भारत में संघ का तेजी से विस्तार हुआ।

उन्होंने कहा, ‘‘उन दिनों दिल्ली से लेकर तत्कालीन अविभाजित पंजाब तक पूरे क्षेत्र में संघ का कार्य बहुत तेजी से बढ़ा। शाखाओं और स्वयंसेवकों की संख्या कई गुना बढ़ गई।’’

आंबेकर ने कहा कि विभाजन के दौरान आरएसएस स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों की सहायता की और कई लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

उन्होंने कहा, ‘‘और शायद उस समय संघ के पास पर्याप्त शक्ति नहीं थी, अन्यथा देश का विभाजन नहीं हुआ होता।’’

उन्होंने आपातकाल का जिक्र करते हुए कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए काम करते समय आरएसएस स्वयंसेवकों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।

आंबेकर ने कहा, ‘‘आपातकाल के दौरान भी यही हुआ। संघ की जितनी भी शक्ति थी, वह पूरी तरह लोकतंत्र की रक्षा में लगी रही। स्वयंसेवकों ने भारी उत्पीड़न सहा।’’

सभा को संबोधित करते हुए आंबेकर ने कहा कि यह वृत्तचित्र आरएसएस स्वयंसेवकों और व्यापक रूप से समाज दोनों के लिए है, ताकि लोग राजनीति से परे संगठन की भूमिका को समझ सकें।

यह वृत्तचित्र दिल्ली में आरएसएस के शुरुआती वर्षों से लेकर वर्तमान तक की यात्रा को दर्शाता है और इसमें विभाजन, आपातकाल, 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान और उसके बाद किए गए राहत कार्यों तथा राजधानी में संघ कार्यालय के इतिहास जैसे प्रसंग शामिल हैं।

साथ ही आंबेकर ने घोषणा की कि संगठन का एक बड़ा शताब्दी समारोह 29 नवंबर को दिल्ली में आयोजित किया जाएगा।

भाषा गोला नरेश

नरेश