नयी दिल्ली, 20 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को ओडिशा की एक सत्र अदालत को निर्देश दिया कि वह उस व्यक्ति के खिलाफ चल रहे मुकदमे की सुनवाई तीन महीने के भीतर पूरा करे, जिसके खिलाफ 2015 में सख्त गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत कथित रूप से गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल होने और राष्ट्र-विरोधी विचारधारा फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि कटक की सत्र अदालत इस मामले की सुनवाई सप्ताह में कम से कम दो बार करेगी। इसी अदालत में इस मामले की सुनवाई हो रही है।
पीठ ने यह आदेश आरोपी मोहम्मद अब्दुर रहमान की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें उसने ओडिशा उच्च न्यायालय के नवंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे जमानत देने से इनकार किया गया था।
वह यूएपीए के तहत दर्ज एक मामले में मुकदमे का सामना कर रहा है, जिसमें उस पर आरोप है कि उसने निर्दोष छात्रों के मन में राष्ट्र-विरोधी विचारधारा फैलाकर उन्हें अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों में भर्ती करने की कोशिश की।
उच्चतम न्यायालय को बताया गया कि याचिकाकर्ता को दिसंबर 2015 में एक अलग यूएपीए मामले में गिरफ्तार किया गया था, जिसकी जांच दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा कर रही थी।
शीर्ष अदालत को यह भी बताया गया कि दिल्ली की एक सुनवाई अदालत ने इस मामले में उसे दोषी ठहराते हुए सात साल और पांच महीने की सजा सुनाई थी।
याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ से कहा कि वह 10 वर्षों से अधिक समय से हिरासत में है और दिल्ली की सुनवाई अदालत द्वारा दी गई सजा भी पूरी कर चुका है।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उसे जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज और ओडिशा की ओर से पेश वकील ने इस याचिका का विरोध किया।
न्यायालय ने कटक की अदालत को तीन महीने के भीतर लंबित सुनवाई पूरी करने का निर्देश देते हुए अभियोजन पक्ष से कहा कि तय तारीखों पर गवाहों की पर्याप्त संख्या में उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।
शीर्ष अदालत ने कहा, “जिस दिन इस मामले की सुनवाई निर्धारित होगी, उस दिन अधीनस्थ अदालत के पीठासीन अधिकारी किसी अन्य मामले को सूचीबद्ध नहीं करेंगे।”
याचिका का निपटारा करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि परिस्थितियां ऐसी बनती हैं या निर्धारित समय के भीतर मुकदमा पूरा नहीं होता है, तो याचिकाकर्ता उच्च न्यायालय का रुख कर सकता है।
उच्च न्यायालय ने उसे जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि जमानत के अनुरोध का एकमात्र आधार उसकी लंबी हिरासत अवधि है, जबकि उसके खिलाफ आरोप न केवल गंभीर बल्कि अत्यंत गंभीर हैं।
उच्च न्यायालय ने भी अधीनस्थ अदालत से मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने और मामले का यथाशीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया था।
भाषा रंजन संतोष
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