नयी दिल्ली, 24 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को केंद्र, छत्तीसगढ़ सरकार और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें परसा ईस्ट एवं केते बासन (पीईकेबी) कोयला ब्लॉक के पास स्थित एक गांव के निवासियों के सामुदायिक वन अधिकारों को लागू करने का अनुरोध किया गया है।
छत्तीसगढ़ में सामुदायिक वन अधिकार स्थानीय आदिवासी समूहों और वन-निवासियों को उनकी पारंपरिक वन भूमि की सुरक्षा, प्रबंधन एवं उपयोग करने का कानूनी अधिकार देते हैं।
शीर्ष अदालत ने ‘हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति’ (एचएबीएसएस) और छह अन्य लोगों की याचिका पर केंद्र, राज्य सरकार, आरआरवीयूएनएल और सरगुजा की ज़िला स्तरीय वन अधिकार समिति (डीएलसी) को नोटिस जारी किए।
इस याचिका में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के 21 अप्रैल के फ़ैसले को चुनौती दी गई है।
उच्च न्यायालय ने समिति और अन्य लोगों की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें कई अन्य बातों के अलावा, घाटबारा के ग्रामीणों द्वारा बताए गए सामुदायिक वन अधिकारों को रद्द करने और पीईकेबी कोयला ब्लॉक में दूसरे चरण के खनन के लिए बाद में मिली मंज़ूरी को चुनौती दी गई थी।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सोमवार के आदेश में कहा कि याचिका पर नोटिस जारी होने के बावजूद, राज्य में आरआरवीयूएनएल की ओर से पीईकेबी कोयला ब्लॉक में जारी खनन गतिविधियां प्रभावित नहीं होंगी।
समिति की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सी यू सिंह की दलीलों पर गौर करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि वह यह पता लगाने के लिए नोटिस जारी कर रहे हैं कि क्या इस मामले में कोई सामुदायिक वन अधिकार मौजूद है।
भाषा नेत्रपाल दिलीप
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