न्यायालय ने परियोजनाओं को पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई फिर शुरू की

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न्यायालय ने परियोजनाओं को पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई फिर शुरू की

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  • Publish Date - February 25, 2026 / 10:19 PM IST,
    Updated On - February 25, 2026 / 10:19 PM IST

नयी दिल्ली, 25 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और अन्य प्राधिकारियों द्वारा पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को भारी जुर्माने के भुगतान पर पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी (ईसी) प्रदान करने से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई बुधवार को फिर से शुरू की।

पिछले साल 18 नवंबर को, तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई के नेतृत्व वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने अपने ही फैसले को 2:1 के बहुमत से एक अंतरिम आदेश द्वारा पलट दिया था और पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी दिये जाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि ऐसा नहीं होने पर ‘‘हजारों करोड़ रुपये बर्बाद हो जाएंगे।’’

उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि 16 मई का वह निर्णय वापस नहीं लिया गया, जिसमें केंद्र को पूर्व प्रभाव से पर्यावरणीय मंजूरी देने पर रोक लगाई गई थी, तो कई महत्वपूर्ण सार्वजनिक परियोजनाएं रुक जाएंगी या उन्हें ध्वस्त करना पड़ेगा, जिससे करीब 20 हजार करोड़ रुपये व्यर्थ हो जाएंगे।

शीर्ष अदालत ने याचिकाओं पर नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और संजय पारिख सहित कई वकीलों की दलीलें सुनीं, जो पर्यावरण मानदंडों का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी दिए जाने का विरोध कर रहे हैं।

शंकरनारायण ने दलील दी कि पूर्व प्रभाव से मंजूरी के लिए वर्तमान कानूनी ढांचा त्रुटिपूर्ण है और इसमें वैधानिक समर्थन का अभाव है। उन्होंने कहा कि 2017 की अधिसूचना, जिसमें उल्लंघनकर्ताओं को पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन करने हेतु एक बार छह महीने की अवधि दी गई थी, एक ‘अस्थायी उपाय’ था जो अप्रैल 2018 में समाप्त हो गया।

उन्होंने कहा, ‘वास्तव में, 13 अप्रैल 2018 के बाद से देश में पूर्व प्रभाव से पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन करने हेतु कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है।’

वरिष्ठ वकील ने केंद्र द्वारा जुलाई 2021 में जारी किए गए एक कार्यालय ज्ञापन (मानक संचालन प्रक्रिया) को भी चुनौती दी और कहा कि मद्रास उच्च न्यायालय ने अगस्त 2024 में इस एसओपी को पहले ही असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

शंकरनारायण ने दलील दी कि तीन न्यायाधीशों की पीठ 18 नवंबर के आदेश को पारित करते समय एलेम्बिक फार्मास्युटिकल्स और कॉमन कॉज जैसी महत्वपूर्ण मिसालों पर विचार करने में विफल रही, जिन्होंने यह स्थापित किया कि पर्यावरण कानून के तहत ‘पूर्व मंजूरी’ एक अनिवार्य शर्त है।

उन्होंने कहा, ‘‘हम पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं क्योंकि यह फैसला (18 नवंबर, 2025 का) स्थापित मिसालों की अनदेखी करते हुए तीन प्रमुख बाधाएं उत्पन्न करता है। अदालत ने मद्रास उच्च न्यायालय के निष्कर्षों की पड़ताल का अवसर गंवा दिया, जिसने कानून को सही ढंग से लागू किया था।’’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने व्यापक संवैधानिक चिंताओं को उठाया।

सुनवाई के दौरान, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत का उद्देश्य एक संक्षिप्त आदेश देने के बजाय ‘गुण-दोष के आधार पर समग्र निर्णय’ देना है।

वहीं केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार अंतिम दलीलों के लिए तैयार है और उन्होंने अंतरिम आदेश का अनुरोध किया।

पीठ बृहस्पतिवार को फिर सुनवायी करेगी।

भाषा

अमित पवनेश

पवनेश