आर्द्रभूमि की परिभाषा ‘‘अस्पष्ट’’ होने को लेकर दायर याचिका पर न्यायालय ने केंद्र से मांगा जवाब
आर्द्रभूमि की परिभाषा ‘‘अस्पष्ट’’ होने को लेकर दायर याचिका पर न्यायालय ने केंद्र से मांगा जवाब
नयी दिल्ली, 26 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा, जिसमें आरोप लगाया गया है कि ‘आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017’ में ‘आर्द्रभूमि’ की परिभाषा अस्पष्ट है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय आर्द्रभूमि समिति को नोटिस जारी करते हुए 10 अगस्त तक जवाब देने को कहा।
पीठ ने कहा, ‘‘हम अपना नोटिस परिभाषा की अस्पष्टता तक सीमित रख रहे हैं।’’
उच्चतम न्यायालय जीवविज्ञानी रवींद्र सिन्हा और अन्य द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के अंतर्गत ‘‘आर्द्रभूमि’’ की परिभाषा की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम के नियम 2(घ) के अनुसार ‘‘आर्द्रभूमि’’ का अर्थ दलदल या जल से आच्छादित क्षेत्र है, चाहे वह प्राकृतिक हो या कृत्रिम, स्थायी हो या अस्थायी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम ने आर्द्रभूमि को मिलने वाले संरक्षण को कमजोर कर दिया है।
उन्होंने कहा कि इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पारिस्थितिकी दृष्टि से संवेदनशील स्थल नियामक सुरक्षा के दायरे से बाहर हो गए हैं और बताया कि 99 में से 44 स्थल नियामक सुरक्षा से बाहर हो गए हैं।
याचिका में दावा किया गया है कि नियम 2(जी) का अपवर्जन संबंधी प्रावधान कई आर्द्रभूमियों को संरक्षण के दायरे से बाहर कर देता है। इसके तहत नदी की धाराओं, धान के खेतों, पेयजल के लिए बनाए गए मानव निर्मित जलाशयों या टैंकों तथा मत्स्य पालन, नमक उत्पादन, मनोरंजन और सिंचाई के लिए विकसित संरचनाओं को आर्द्रभूमि की श्रेणी से बाहर रखा गया है।
याचिका में यह घोषित करने की मांग की गई है कि आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रबंधन नियम, 2017 का नियम 2(जी) संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के विरुद्ध है।
भाषा
खारी नरेश
नरेश

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