एसआईआर पर तृणमूल सांसदों की नयी याचिकाओं पर न्यायालय ने निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा

एसआईआर पर तृणमूल सांसदों की नयी याचिकाओं पर न्यायालय ने निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा

एसआईआर पर तृणमूल सांसदों की नयी याचिकाओं पर न्यायालय ने निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा
Modified Date: January 12, 2026 / 05:34 pm IST
Published Date: January 12, 2026 5:34 pm IST

नयी दिल्ली, 12 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में मनमानी और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं का आरोप लगाने संबंधी तृणमूल कांग्रेस सांसदों की नयी अंतरिम याचिकाओं पर सोमवार को निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने बंगाल में जारी एसआईआर में की गई प्रक्रियात्मक कार्रवाइयों को चुनौती देते हुए सांसद डेरेक ओब्रायन और डोला सेन द्वारा दायर उनकी लंबित याचिकाओं पर गौर किया।

डेरेक ओब्रायन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि निर्वाचन आयोग के एसआईआर संबंधी निर्देश व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया मंच के माध्यम से जारी किए जा रहे हैं और बूथ-स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) को बिना किसी औपचारिक आदेश के ही कार्य करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

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सिब्बल ने यह भी कहा कि आयोग ने उन मतदाताओं की एक ‘तार्किक विसंगति’ श्रेणी बनाई है, जिनके मतदाता विवरण में त्रुटियों के कारण उनकी पात्रता पर अर्ध-न्यायिक सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया जा सकता है।

निर्वाचन आयोग के वकील ने याचिकाओं का जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा है।

प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्वाचन आयोग को तृणमूल के दोनों सांसदों की याचिकाओं पर एक संयुक्त जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया। इसके बाद, याचिका पर सुनवाई के लिए 19 जनवरी की तारीख तय की।

डेरेक ओब्रायन ने अपनी याचिका में राज्य में मतदाता सूचियों की एसआईआर प्रक्रिया में मनमानी किये जाने और अनियमितताओं का आरोप लगाया है। याचिका में कहा गया है कि राज्य में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद से, निर्वाचन आयोग ने औपचारिक लिखित निर्देश जारी करने के बजाय व्हाट्सएप संदेशों और वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान मौखिक निर्देशों जैसे ‘‘अनौपचारिक और गैर-कानूनी माध्यमों’’ से जमीनी स्तर के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं।

इसमें कहा गया है, ‘‘निर्वाचन आयोग मनमाने ढंग से या कानून के बाहर कार्य नहीं कर सकता, न ही यह कानूनी रूप से निर्धारित और तय प्रक्रियाओं को तदर्थ या अनौपचारिक तंत्रों से प्रतिस्थापित कर सकता है।’’

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल में घोषणा की थी कि वह एसआईआर के खिलाफ अदालत का रुख करेंगी। उन्होंने आरोप लगाया था कि इस प्रक्रिया ने भय, उत्पीड़न और प्रशासनिक मनमानी को जन्म दिया है।

अपनी याचिका में ओब्रायन ने कहा कि पश्चिम बंगाल के लिए मसौदा मतदाता सूची का प्रकाशन 16 दिसंबर 2025 को किया गया था, ‘‘जिससे पात्र और वास्तविक मतदाताओं को होने वाली कठिनाइयां काफी बढ़ गई हैं, जिसका कारण प्रतिवादी संख्या 1 (निर्वाचन आयोग) द्वारा की गई मनमानी और प्रक्रियात्मक रूप से अनियमित कार्रवाइयों की एक निरंतर श्रृंखला है।’’

इसमें कहा गया है कि पिछले साल 30 नवंबर को आयोग ने संशोधन कार्यक्रम के संबंध में केवल सीमित अवधि के लिए ही समय बढ़ाया था तथा दावे और आपत्तियां प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 15 जनवरी 2026 तय की थी।

याचिका में, आयोग को दावे और आपत्तियां प्रस्तुत करने की समय सीमा बढ़ाने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

इसमें आरोप लगाया गया कि पश्चिम बंगाल में 16 दिसंबर 2025 को मसौदा सूची प्रकाशित की गई थी और बिना किसी सूचना या व्यक्तिगत सुनवाई के 58,20,898 नाम हटा दिए गए।

सांसद डोला सेन की याचिका में दलील दी गई है कि एसआईआर आदेश मनमाने और असंवैधानिक हैं तथा इनसे वैध मतदाताओं के नाम गैर कानूनी तरीके से हटाए जाएंगे।

भाषा सुभाष मनीषा

मनीषा


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