नयी दिल्ली, पांच अगस्त (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने 2020 में सीलमपुर में एक युवक की हत्या के प्रयास के आरोपी दो व्यक्तियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की हमलावर के रूप में पहचान स्थापित करने में विफल रहा और जांच पर गंभीर संदेह पैदा होते हैं, जिसमें हथियारों की कथित बरामदगी भी शामिल है।
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश संजय शर्मा उस मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें चौहान पट्टी उर्फ अजीम और फईम पर सीलमपुर थाने में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर हत्या के प्रयास और शस्त्र अधिनियम की धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।
अदालत ने चार अगस्त को पारित आदेश में कहा, ‘‘आरोपी चौहान पट्टी उर्फ अजीम और फईम से हथियार की कथित तौर पर बरामदगी अत्यधिक संदिग्ध हो जाती है और उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब शिकायतकर्ता ने न तो चौहान पट्टी की पहचान अपने हमलावर के रूप में की और न ही आरोपी से कथित तौर पर बरामद हथियार की पहचान की।’’
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता आशु ने आरोप लगाया था कि 19 जून, 2020 को उस पर गोली चलाई गई और वह घायल हो गया। उसके अनुसार, यह घटना चौहान पट्टी और एक नाबालिग के साथ हुई कहासुनी के एक दिन बाद हुई थी। पुलिस ने दावा किया था कि बाद में आरोपियों से हथियार बरामद किया गया और घटना में इस्तेमाल हथियार फईम ने उपलब्ध कराया था।
हालांकि, सुनवाई के दौरान घायल शिकायतकर्ता अदालत में चौहान पट्टी की पहचान गोली चलाने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं कर सका और उसने अपने पहले के आरोपों से मुकरते हुए कहा कि आरोपी वह व्यक्ति नहीं था, जिसने उस पर गोली चलाई थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने उससे कोरे कागजों पर हस्ताक्षर करा लिए थे।
अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता न केवल अदालत में आरोपियों की पहचान करने में असफल रहा, बल्कि उस शिकायत से भी मुकर गया, जिसके आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। न्यायाधीश ने कहा कि किसी अन्य गवाह ने भी आरोपियों की पहचान हमलावरों के रूप में स्थापित नहीं की।
हथियारों की बरामदगी को लेकर अभियोजन के मामले पर सवाल उठाते हुए अदालत ने कहा कि कथित बरामदगी के दौरान कोई स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह शामिल नहीं किया गया, जबकि गिरफ्तारियां और तलाशी घनी आबादी वाले सार्वजनिक स्थानों पर हुई थीं।
अदालत ने कहा, ‘‘यह अत्यंत असंभावित है’’ कि किसी गोलीबारी का आरोपी व्यक्ति घटना में इस्तेमाल हथियार लेकर सार्वजनिक स्थान पर घूमता रहेगा।
न्यायाधीश ने यह भी कहा कि जिस डॉक्टर द्वारा पीड़ित के पैर से कथित तौर पर गोली निकाली गई थी, उसे कभी अदालत में पेश नहीं किया गया, जिससे अभियोजन के मामले में ‘‘महत्वपूर्ण कड़ी वाला साक्ष्य’’ उपलब्ध नहीं हो पाया।
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। इसके बाद अदालत ने दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
भाषा अमित दिलीप
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