शिवसेना का ढांचा बना दिया गया ‘एक व्यक्ति केंद्रित’, पार्टी के संविधान पर न्यायालय की टिप्पणी
शिवसेना का ढांचा बना दिया गया ‘एक व्यक्ति केंद्रित’, पार्टी के संविधान पर न्यायालय की टिप्पणी
नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) लोकतांत्रिक सिद्धांत को सिर्फ संस्थाओं तक ही सीमित नहीं रखे जाने का उल्लेख करते हुए उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को शिवसेना के संशोधित संविधान पर सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि इसने पार्टी को “असल में एक व्यक्ति केंद्रित ढांचा” बना दिया।
निर्वाचन आयोग के फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे गुट की याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि जब संस्थाओं से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की उम्मीद की जाती है, तो राजनीतिक दलों की भी जांच होनी चाहिए कि क्या वे लोकतांत्रिक ढंग से काम करते हैं। निर्वाचन आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को “असली शिवसेना” के तौर पर मान्यता दी थी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा, “शुरुआत में, पार्टी (शिवसेना) का संविधान लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित था। बाद में, इसमें संशोधन किया गया और यह असल में एक व्यक्ति के नियंत्रण वाला ढांचा बन गया।”
उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, “असली सवाल यह है कि यह मामला निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “जब हम लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वाले लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संस्थाओं की बात करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या किसी राजनीतिक पार्टी से खुद लोकतांत्रिक ढंग से काम करने की उम्मीद की जाती है।”
सिब्बल ने कहा कि वे इस बात से सहमत हैं कि पार्टियों को भी लोकतांत्रिक ढंग से काम करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “लेकिन दोनों में फर्क है। संवैधानिक संस्थाएं संवैधानिक काम करती हैं, जबकि राजनीतिक पार्टियां राजनीतिक काम करती हैं। जब कोई संवैधानिक संस्था अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करती है, तो उसकी संस्थागत ईमानदारी का स्तर बहुत ऊंचा होना जरूरी है। राजनीतिक फैसले को हमेशा सुधारा जा सकता है। लेकिन इन हालात में निर्वाचन आयोग का कोई फैसला एक बार ले लिए जाने के बाद, उसे असल में व्यावहारिक तौर पर बदला नहीं जा सकता।”
सिब्बल ने कहा कि ज्यादा से ज्यादा, निर्वाचन आयोग पार्टी से अपने संविधान में संशोधन करने के लिए कह सकता था।
उन्होंने कहा, “हम ऐसी कई राजनीतिक पार्टियों के बारे में जानते हैं जिन्होंने बरसों से संगठनात्मक चुनाव नहीं कराए हैं।”
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “क्या (निर्वाचन) आयोग ने कभी ऐसा माना है कि उनके संविधान अलोकतांत्रिक हैं और इसलिए उन्हें मान्यता देने से इनकार कर दिया है? ठीक इसी तर्क के आधार पर उसने यहां 2018 के संविधान पर भरोसा करने से इनकार कर दिया।”
उन्होंने कहा कि आखिरकार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थागत ईमानदारी सबसे अहम होती है और इसके न होने से लोकतंत्र की नींव ही हिल जाती है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने खुद संस्थागत ईमानदारी के महत्व को बहुत अच्छे से बताया और डॉ. बी.आर. आंबेडकर का जिक्र किया।
उन्होंने कहा, “उसने डॉ. आंबेडकर की बातों को दोहराया और इस विचार का भी जिक्र किया है कि दल-बदल एक संवैधानिक पाप है। लेकिन आज, ऐसा लगता है कि यह कोई पाप नहीं, बल्कि सम्मान की बात बन गया है… डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे लागू करने वाले लोग ही बुरे हों, तो वह बुरा ही साबित होगा।”
सिब्बल ने कहा, ‘‘हमारा मामला बिल्कुल ऐसा ही है।’’
वरिष्ठ अधिवक्ता ने निर्वाचन आयोग के काम करने के तरीके की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उसने पार्टी के अंदरूनी संविधान को अमान्य करके अपने कानूनी अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है, ताकि संगठनात्मक समर्थन के बजाय विधायी शक्ति को प्राथमिकता दी जा सके।
सिब्बल की दलील का मुख्य बिंदु निर्वाचन आयोग का वह फैसला था जिसमें उसने शिवसेना के 2018 के संविधान को नजरअंदाज कर दिया था।
आयोग ने पहले कहा था कि 2018 का दस्तावेज उसके रिकॉर्ड में नहीं है और अपने फैसले को सही ठहराने के लिए उसने 1999 के संस्करण का सहारा लिया था।
सिब्बल ने कहा, “निर्वाचन आयोग के पास किसी पार्टी के संविधान की वैधता पर फैसला सुनाने का कोई न्यायिक अधिकार नहीं है।”
मामले की सुनवाई 11 अगस्त को फिर से शुरू होगी।
भाषा प्रशांत नेत्रपाल
नेत्रपाल

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