सिद्धरमैया : ‘जनता परिवार’ के वफादार से कांग्रेस के कद्दावर नेता तक
सिद्धरमैया : ‘जनता परिवार’ के वफादार से कांग्रेस के कद्दावर नेता तक
(तस्वीरों के साथ)
बेंगलुरु, 28 मई (भाषा) दो दशक से अधिक समय तक ‘जनता परिवार’ के वफादार नेताओं में शुमार सिद्धरमैया अतीत में कांग्रेस के खिलाफ अपने मुखर रुख के लिए जाने जाते थे। हालांकि, 2006 में कांग्रेस में शामिल होने के बाद वह न सिर्फ खुद को पार्टी के एक कद्दावर नेता के रूप में स्थापित करने में कामयाब हुए, बल्कि सबसे लंबे समय तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद पर सेवा देने की उपलब्धि भी हासिल की।
नौ बार विधायक रहे सिद्धरमैया (77) ने मुख्यमंत्री के रूप में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने और एक “शानदार” विदाई पाने की अपनी महत्वाकांक्षा कभी छिपाई नहीं। हालांकि, कांग्रेस आलाकमान ने कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करने के लिए सिद्धरमैया से उनके कार्यकाल की समाप्ति के लगभग दो साल पहले ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए कह दिया।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान सिद्धरमैया ने सात जनवरी 2026 को सबसे लंबे समय तक राज्य के शीर्ष पद (मुख्यमंत्री) पर रहने का वरिष्ठ कांग्रेस नेता देवराज उर्स का रिकॉर्ड तोड़ दिया। सिद्धरमैया की तरह ही देवराज भी मैसूर से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में अपने दो कार्यकाल के दौरान कुल 2,792 दिन तक इस पद पर सेवाएं दी थीं।
एक गरीब किसान परिवार से आने वाले सिद्धरमैया 1980 के दशक की शुरुआत से लेकर 2005 तक कांग्रेस के कट्टर विरोधी थे। हालांकि, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली जनता दल-सेक्युलर (जद-एस) से निष्कासन के बाद उन्होंने 2006 में उसी पार्टी में शामिल होने का फैसला किया, जिसके वह कट्टर विरोधी हुआ करते थे।
कानून की डिग्री रखने वाले सिद्धरमैया ने एक समय “राजनीति से संन्यास” लेने की बात कही थी। उन्होंने वकालत के पेशे में लौटने के बारे में भी सोचा था। सिद्धरमैया ने खुद की पार्टी बनाने की संभावनाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इसके लिए उनके पास न तो धन है और न ही बल।
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ने सिद्धरमैया को अपने पाले में लाने की कोशिश की। हालांकि, सिद्धरमैया ने कहा कि वह भाजपा की विचारधारा से इत्तफाक नहीं रखते हैं और अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल हो गए। उनके इस कदम को उस समय “कल्पना से परे” माना गया था।
‘जनता परिवार’ के सदस्य के रूप में सिद्धरमैया राम मनोहर लोहिया द्वारा प्रतिपादित समाजवाद से प्रभावित थे। उन्होंने वकालत का पेशा छोड़कर राजनीति की दुनिया में कदम रखा और तालुक बोर्ड के सदस्य के रूप में सियासी सफर की शुरुआत की।
कांग्रेस में सिद्धरमैया का धैर्य और दृढ़ता रंग लाई तथा 2013 में कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनने का उनका सपना साकार हो गया। वह मई 2018 तक इस पद पर रहे। 2023 में कर्नाटक की सत्ता में कांग्रेस की वापसी के बाद उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री पद पर सेवा देने का मौका मिला।
कर्नाटक में 2004 में हुए विधानसभा चुनाव में खंडित जनादेश के बाद कांग्रेस और जद(एस) ने गठबंधन सरकार बनाई। उस समय जद(एस) का हिस्सा रहे सिद्धरमैया को राज्य का उपमुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि कांग्रेस के एन धरम सिंह को मुख्यमंत्री पद सौंपा गया। सिद्धरमैया को हमेशा इस बात का मलाल रहा कि उस समय उनके पास मुख्यमंत्री बनने का मौका था, लेकिन देवेगौड़ा ने उनकी संभावनाओं पर पानी फेर दिया।
कर्नाटक की तीसरी सबसे बड़ी जाति कुरुबा से ताल्लुक रखने वाले सिद्घरमैया ने इस घटनाक्रम के बाद 2005 में खुद को पिछड़े वर्गों के नेता के रूप में पेश करने का फैसला किया। उन्होंने अहिंदा (कर्नाटक में अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला संक्षिप्त नाम) सम्मेलनों की अगुवाई शुरू कर दी। उस दौर में देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी को जद(एस) को उभरते सितारे के रूप में देखा जा रहा था।
सिद्धरमैया ने 1983 में अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा था और मैसूरु के चामुंडेश्वरी से लोक दल पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए थे। वह रामकृष्ण हेगड़े के मुख्यमंत्री काल में गठित ‘कन्नड़ कवालु समिति’ के पहले अध्यक्ष थे। इस समिति को कन्नड़ को आधिकारिक भाषा के रूप में लागू करने की प्रक्रिया की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया था। बाद में सिद्धरमैया राज्य के रेशम उत्पादन मंत्री बने।
मैसुरु जिले के सिद्धरमनहुंडी गांव में 12 अगस्त 1948 को जन्मे सिद्धरमैया ने मैसूर विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक किया। बाद में उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की और कुछ समय तक वकालत की दुनिया में सक्रिय रहे।
सिद्धरमैया की शादी पार्वती से हुई। उनके दो बेटे थे। बड़े बेटे राकेश को एक समय सिद्धरमैया का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था, लेकिन 2016 में उनका निधन हो गया। वहीं, छोटे बेटे डॉ. यतींद्र कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) हैं।
कर्नाटक में लोकप्रिय गारंटी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जाने जाने वाले निवर्तमान मुख्यमंत्री पर अपनी पत्नी को मैसुरु शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) की एक योजना के तहत वैकल्पिक जमीन के आवंटन में अनियमितताओं के आरोप भी लगे।
बृहस्पतिवार को सिद्धरमैया के इस्तीफे से कर्नाटक में “बारी-बारी से सत्ता साझा करने के फॉर्मूले” के तहत उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के साथ लंबे समय से जारी उनके सत्ता-संघर्ष का भी अंत हो गया।
भाषा पारुल नरेश
नरेश

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