हिंसा की शिकार महिला की चुप्पी अपवाद नहीं बल्कि आम बात है: न्यायालय

हिंसा की शिकार महिला की चुप्पी अपवाद नहीं बल्कि आम बात है: न्यायालय

हिंसा की शिकार महिला की चुप्पी अपवाद नहीं बल्कि आम बात है: न्यायालय
Modified Date: September 24, 2026 / 09:07 pm IST
Published Date: September 24, 2026 9:07 pm IST

नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि किसी महिला पर अपने पति द्वारा की गई यौन या शारीरिक हिंसा की घटनाओं की शिकायत न कर पाने के लिए संदेह नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारतीय संदर्भ में ऐसी चुप्पी कोई अपवाद नहीं बल्कि एक आम बात है।

शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी एक ऐसे व्यक्ति के बचाव को खारिज करते हुए की, जिसे अपनी छह साल की सौतेली बेटी के बार-बार यौन शोषण करने और उसकी हत्या का दोषी ठहराया गया था। उस व्यक्ति का तर्क था कि उसे अपनी पत्नी की गवाही के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती जिसने इस अपराध के बारे में लंबे समय तक चुप्पी साध रखी थी।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा, ‘‘घर के भीतर होने वाले शोषण की सच्चाई को समझने वाली अदालत को इस चाल में आने के प्रति सावधान रहना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शोषण करने वाले व्यक्ति द्वारा अपनी हिंसा का शिकार महिला पर थोपी गई मजबूरियों का फायदा उसे न मिले।’’

पीठ ने इस बात का संज्ञान लिया कि 2019 से 2021 के बीच किए गए पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, भारत में 18 से 49 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 29.3 प्रतिशत विवाहित महिलाओं ने अपने पति द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव करने की बात कही थी।

न्यायालय ने कहा कि सर्वेक्षण के अनुसार, ‘‘जिन महिलाओं ने ऐसी हिंसा का अनुभव किया, उनमें से लगभग तीन-चौथाई महिलाओं ने कभी किसी से मदद नहीं मांगी और न ही किसी को इस हिंसा के बारे में बताया।’’

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘देश के सबसे बड़े ऐसे सर्वेक्षण से मिले ये आंकड़े साबित करते हैं कि पीड़ित महिला की चुप्पी कोई अपवाद नहीं बल्कि एक आम बात है, और घटना की रिपोर्ट न करना एक बहुत ही सामान्य प्रतिक्रिया है, न कि कोई ऐसी असामान्य बात जिस पर शक किया जाए।’’

पीठ ने उस व्यक्ति को सुनाई गई मौत की सजा को बदलकर आजीवन कारावास की सजा में बदल दिया।

शीर्ष अदालत ने दोषी द्वारा दायर एक अपील पर अपना फैसला सुनाया। दोषी ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के नवंबर 2019 के फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें इस मामले में उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा को बरकरार रखा गया था।

भाषा वैभव पवनेश

पवनेश


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