नयी दिल्ली, 24 अगस्त (भाषा) ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ संबंधी विधेयकों पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने सोमवार को कहा कि यदि अगले साल संविधान में संशोधन हो जाता है और राज्य तैयार होते हैं तो 2029 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराया जाना संभव है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस बारे में राज्यों को निर्देशित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह सब उनकी मंशा पर निर्भर करता है।
समिति की बैठक के बाद संवाददाताओं से बातचीत में चौधरी ने कहा कि यदि 2028 में संविधान संशोधन हो जाता है तो 2029 में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ लागू करने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि 2029 में जो लोकसभा चुनाव होगा, , उस समय राज्य चाहें तो (विधानसभा) भंग करके विधानसभा चुनाव भी करा सकते हैं।
उनका कहना था, ‘‘यह तो राज्यों पर निर्भर करता है। यदि किसी राज्य का मंत्रिपरिषद यह निर्णय लेता है कि लोकसभा चुनाव के साथ उसके भी चुनाव हो जाएं, तो यह हो सकता है। भारत के संविधान के तहत उन्हें यह अधिकार मिला हुआ है।’’
संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर विचार कर रही संसद की संयुक्त समिति के समक्ष पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम भी उपस्थित हुए और अपनी राय रखी। उन्होंने एक साथ चुनाव के विचार को असंवैधानिक बताया।
इन विधेयकों का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ कराना है।
बैठक के बाद भाजपा सांसद चौधरी ने कहा कि समिति के सभी सदस्य अपनी विचारधारा से ऊपर उठकर काम कर रहे हैं, ताकि ‘‘अच्छे से अच्छा विधेयक’’ तैयार किया जा सके।
उन्होंने कहा कि पद्म पुरस्कार से सम्मानित लोगों ने भी समिति के समक्ष अपने विचार रखे और उनका मानना था कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ राष्ट्रीय हित में है।
उन्होंने बताया कि दो गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के प्रतिनिधियों ने भी समिति के सामने अपनी राय रखी।
समिति के अध्यक्ष ने कहा कि देश में बार-बार होने वाले चुनावों का असर सरकारी स्कूलों के बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ता है।
उनके अनुसार, चुनाव और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के कारण इन बच्चों का करीब 30 प्रतिशत समय प्रभावित होता है।
चौधरी ने कहा कि एक साथ चुनाव होने से देश को बड़ा फायदा होगा और इसका सबसे अधिक लाभ युवाओं को मिलेगा।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग राजनीतिक दलों की विचारधारा अलग हो सकती है और समिति सभी पक्षों को सुनना चाहती है।
उन्होंने कहा कि समिति का उद्देश्य यह देखना है कि ‘‘जनता की मंशा क्या है’’ और क्या लोग चाहते हैं कि देश में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की व्यवस्था लागू हो?
चौधरी का कहना था कि देश के लोग चाहते हैं कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ हों।
ये विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे, जिसके बाद इन्हें विचार के लिए संयुक्त समिति के पास भेज दिया गया था।
इन विधेयकों को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया है। समिति ने चरणबद्ध तरीके से लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी कोविंद की अध्यक्षता वाली इस उच्चस्तरीय समिति के सदस्य थे।
संविधान लागू होने के बाद 1951 से 1967 तक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे।
पहला आम चुनाव 1951-52 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ हुआ था। यह व्यवस्था 1957, 1962 और 1967 के अगले तीन आम चुनावों में भी जारी रही।
हालांकि, कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण 1968 और 1969 में एक साथ चुनावों का यह चक्र बाधित हो गया।
फिर चौथी लोकसभा भी 1970 में समय से पहले भंग कर दी गई और 1971 में नए चुनाव हुए। पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा के विपरीत पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल आपातकाल लागू किए जाने के कारण संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत 1977 तक बढ़ाया गया था।
इसके बाद लोकसभा के केवल कुछ कार्यकाल ही पूरे पांच वर्ष चले, जिनमें आठवीं, दसवीं, 14वीं और 15वीं लोकसभा शामिल हैं। छठी, सातवीं, नौवीं, 11वीं, 12वीं और 13वीं लोकसभा सहित अन्य सदनों को समय से पहले भंग कर दिया गया था।
राज्य विधानसभाओं को भी इसी तरह के व्यवधानों का सामना करना पड़ा है। समय से पहले विधानसभा भंग होने और कार्यकाल बढ़ाए जाने की घटनाएं वर्षों से सामने आती रही हैं।
इन घटनाक्रमों ने एक साथ चुनाव के चक्र को पूरी तरह बाधित कर दिया और इसके परिणामस्वरूप देश में अलग अलग समय पर चुनाव होने लगे।
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