नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) ‘‘फ्रंटियर्स इन मेडिसिन’’ पत्रिका में प्रकाशित एक क्लिनिकल परीक्षण निष्कर्ष में पता चला है कि मानकीकृत अश्वगंधा जड़ अर्क का 24 सप्ताह तक रोजाना सेवन सुरक्षित पाया गया और इससे इलाज के दौरान यकृत या गुर्दे को नुकसान होने का कोई प्रमाण नहीं मिला।
यह शोध 20 अगस्त को प्रकाशित हुआ, जिसमें 18 से 70 वर्ष की आयु के स्वस्थ दिखने वाले उन 1,200 लोगों को शामिल किया गया था, जिन्हें कोविशील्ड टीके की पहली, दूसरी या बूस्टर खुराक लगी थी।
यह अध्ययन ‘‘फ्रंटियर्स इन मेडिसिन’’ पत्रिका के खंड 13 में प्रकाशित हुआ।
भारत के सात केंद्रों पर किए गए इस अध्ययन में 45 शोधकर्ता शामिल थे। ये शोधकर्ता केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस), अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर, आयुष सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय सहित नौ संस्थानों के थे।
प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह को रोजाना 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय अश्वगंधा जड़ अर्क दिया गया, जो चार ग्राम कच्चे जड़ के बराबर था, जबकि दूसरे समूह को इसके समान दिखने वाली ‘प्लेसीबो’ दवा दी गई।
यह दवा 24 सप्ताह तक दी गई और प्रतिभागियों की निगरानी 28वें सप्ताह तक की गई। अध्ययन में शामिल 1,200 प्रतिभागियों में से 1,032 (86 प्रतिशत) ने अध्ययन पूरा किया।
शोधकर्ताओं ने लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और रक्त यूरिया जैसे मानकों के आधार पर यकृत और गुर्दे की कार्यप्रणाली का आकलन किया।
अध्ययन में बताया गया कि ये सभी मानक तय संदर्भ सीमा के भीतर रहे और इलाज के दौरान यकृत या गुर्दे को नुकसान का कोई प्रमाण नहीं मिला।
भाषा जोहेब अविनाश
अविनाश