उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश ने महिलाओं को तुरंत कानूनी सहायता देने की जरूरत बताई

उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश ने महिलाओं को तुरंत कानूनी सहायता देने की जरूरत बताई

उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश ने महिलाओं को तुरंत कानूनी सहायता देने की जरूरत बताई
Modified Date: August 8, 2026 / 05:07 pm IST
Published Date: August 8, 2026 5:07 pm IST

बेंगलुरु, आठ अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने शनिवार को वारदात के तुरंत बाद महिलाओं को कानूनी सहायता प्रदान किए जाने की वकालत की। साथ ही, उन्होंने कर्नाटक में हाल ही में हुए उन बदलावों की ओर भी इशारा किया, जिनसे नियमित प्रथम अपील पर उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र कम हो गया है।

वे राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) द्वारा कर्नाटक उच्च न्यायालय और कर्नाटक न्यायिक अकादमी के सहयोग से आयोजित “महिलाओं के लिए न्याय” विषय पर दो दिवसीय ‘दक्षिण जोन क्षेत्रीय सम्मेलन’ का उद्घाटन करने के बाद बोल रही थीं।

सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि किसी घटना के तुरंत बाद पुलिस थानों या अस्पतालों में कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

उन्होंने कहा, “एक ज्यादा व्यवस्थित ढांचा बनाया जाना चाहिए ताकि तालुका स्तर तक राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों और गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सरकारी अस्पतालों व पुलिस थानों के बीच बेहतर तालमेल बन सके।”

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी सुझाव दिया कि कानूनी सहायता के असर के आधार पर इसकी प्रभावशीलता का अध्ययन किया जाना चाहिए, न कि केवल उन लोगों की संख्या के आधार पर जिन्हें कानूनी सहायता मिली है।

उन्होंने कहा कि पैरालीगल स्वयंसेवकों को सूचना मिलने पर कम समय में उपलब्ध रहना चाहिए ताकि महिलाओं को तुरंत मदद मिल सके।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि अप्रैल 2025 और मार्च 2026 के बीच 4,14,795 महिलाओं ने कानूनी मदद ली और इस आंकड़े को “काबिले-तारीफ” बताया।

उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समिति की प्रमुख के तौर पर, उन्होंने सुझाव दिया कि जब भी उच्च न्यायालय कानूनी सहायता के जरिए किसी मामले का फैसला करे, तो समिति को इसकी सूचना भेजी जानी चाहिए, ताकि हारने वाला कोई पक्ष अगर न्यायालय जाना चाहे, तो पहले से जरूरी जानकारी और सहायता मिल सके।

कर्नाटक से जुड़े एक मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने कहा कि ‘कर्नाटक दीवानी अदालत संशोधन अधिनियम, 2023’ और ‘कर्नाटक उच्च न्यायालय संशोधन अधिनियम, 2023’ में हाल ही में किए गए संशोधनों ने उच्च न्यायालय से पहली अपील सुनने का अधिकार छीन लिया है।

उन्होंने कहा कि संशोधित व्यवस्था के तहत, दीवानी न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) द्वारा पारित निर्णय और डिक्री के खिलाफ अपील जिला अदालत में की जा सकती है, न कि उच्च न्यायालय में।

भाषा प्रशांत संतोष

संतोष


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