न्यायालय ने उप्र गैंगस्टर्स एक्ट पर जताई आपत्ति, कहा- दुरुपयोग की आशंका
न्यायालय ने उप्र गैंगस्टर्स एक्ट पर जताई आपत्ति, कहा- दुरुपयोग की आशंका
नयी दिल्ली, 21 अगस्त (भाषा) उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम का दुरुपयोग होने की आशंका जताते हुये उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि 1986 का यह कानून ‘जन्म से ही निष्प्रभावी’ है, क्योंकि किसी व्यक्ति को केवल ‘गैंगस्टर’ का ठप्पा लगाकर सजा नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि यह कानून हिंसा और संगठित आपराधिक गतिविधियों को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया था लेकिन इसका इस्तेमाल निर्दोष नागरिकों के खिलाफ किया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एवं असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम एक विशेष कानून है, जिसे संगठित अपराध सिंडिकेट, आपराधिक गिरोहों और आदतन असामाजिक तत्वों को नियंत्रित करने, निशाना बनाने और दंडित करने के उद्देश्य से बनाया गया था।
‘जन्म से ही निष्प्रभावी’ एक कानूनी शब्द है, जिसका इस्तेमाल किसी अधिनियम को उसकी शुरुआत से ही अमान्य, शून्य या कानूनी रूप से मृत बताने के लिए किया जाता है, क्योंकि यह एक वैध कानूनी अपराध को परिभाषित करने में विफल रहता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यह कानून ‘हिंसा रोकने के बहाने’ नागरिकों के खिलाफ ही हिंसा को ‘बढ़ावा’ देने वाला साबित हो सकता है।
उच्चतम न्यायालय ने अंग्रेजी लेखक जॉर्ज ऑरवेल का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘जो लोग हिंसा से दूर रहते हैं, वे ऐसा केवल इसलिए कर सकते हैं क्योंकि उनकी ओर से अन्य लोग हिंसा कर रहे होते हैं।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि आपराधिक गिरोहों के खतरे को रोकना ज़रूरी है, लेकिन मकसद को पाने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल सही नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब ऐसा कोई दंडात्मक कानून बनाया जा रहा हो जो नागरिकों की आज़ादी में दखल देता हो।
पीठ ने कहा, ‘‘इस कानून के प्रावधानों के तहत आरोपी को बिना मुकदमे के लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता है, जो एहतियाती हिरासत वाले कानून जैसा ही है।
हालांकि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत कुछ परिस्थितियों में निवारक हिरासत की अनुमति दी गई है,लेकिन इसके साथ कुछ सुरक्षा उपाय भी जुड़े हैं। इन सुरक्षा उपायों को बहुत अहम माना जाता है और प्रक्रिया में मामूली सी भी चूक होने पर हिरासत में रखे गए व्यक्ति को रिहा करना पड़ सकता है…।’’
अदालत ने कहा कि सामाजिक खतरा कितना भी गंभीर क्यों न हो, उससे निपटने के लिए बनाया गया कोई भी दंडात्मक कानून किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ मनमानी और स्वेच्छाचारी कार्रवाई का माध्यम नहीं बन सकता।
उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत दो अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए सुनाया।
भाषा शोभना रंजन
रंजन

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