इंडियाबुल्स जांच में चुप्पी को लेकर न्यायालय ने सीबीआई, दिल्ली पुलिस की ईओडब्ल्यू को फटकारा

इंडियाबुल्स जांच में चुप्पी को लेकर न्यायालय ने सीबीआई, दिल्ली पुलिस की ईओडब्ल्यू को फटकारा

इंडियाबुल्स जांच में चुप्पी को लेकर न्यायालय ने सीबीआई, दिल्ली पुलिस की ईओडब्ल्यू को फटकारा
Modified Date: July 28, 2026 / 08:58 pm IST
Published Date: July 28, 2026 8:58 pm IST

नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (आईएचएफएल) से जुड़े कथित संदिग्ध लेनदेन के आरोपों पर चुप्पी साधने को लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) और दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) को मंगलवार को फटकार लगाई।

न्यायालय ने दोनों एजेंसियों के रवैये को “हैरान करने वाला” बताया और कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला ‘‘एक-दूसरे को परस्पर लाभ पहुंचाने’’ का प्रतीत होता है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की आलोचना करते हुए कहा कि उसने न तो पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद नियमित मामला दर्ज करने पर कोई अंतिम निर्णय लिया है और न ही अब तक की गई जांच की स्थिति रिपोर्ट दाखिल की है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘‘सीबीआई और दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की लापरवाही के कारण, क्योंकि उन्होंने न तो स्थिति रिपोर्ट दाखिल की और न ही जांच के लिए नियमित मामला (आरसी) दर्ज करने के संबंध में उठाए गए कदमों से इस अदालत को अवगत कराया, हम इन एजेंसियों के प्रमुखों को तलब करते। लेकिन अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एस वी राजू के आग्रह पर ऐसा नहीं किया, जिन्होंने आश्वासन दिया है कि जरूरी कदम उठाए जाएंगे और दो सप्ताह के भीतर स्थिति रिपोर्ट दाखिल की जाएगी।’’

इसने शुरुआत में सीबीआई निदेशक और दिल्ली पुलिस आयुक्त की अदालत में मौजूदगी का निर्देश दिया था, लेकिन एएसजी राजू के आश्वासन के बाद उक्त कदम को टाल दिया। राजू ने अदालत को भरोसा दिलाया कि दो सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा और स्थिति रिपोर्ट दाखिल की जाएगी।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, “यह मामला हमारे लिए बेहद चौंकाने वाला है। जांच एजेंसियां मामले में जांच की स्थिति को लेकर चुप हैं। निश्चित रूप से यह एक-दूसरे को परस्पर लाभ पहुंचाने का मामला है। वे पूरी तरह चुप हैं… स्थिति रिपोर्ट दाखिल करें।”

याचिकाकर्ता गैर सरकारी संगठन ‘सिटिजन्स व्हिसल ब्लोअर्स फोरम’ की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि सीबीआई की जनवरी में दाखिल अंतिम रिपोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा धन की हेराफेरी के मामलों का पता लगाए जाने का उल्लेख किया गया था।

भूषण ने कहा कि ईओडब्ल्यू ने कुछ प्राथमिकी दर्ज की थीं और सीबीआई ईडी द्वारा चिह्नित पांच मामलों को येस बैंक जांच के साथ जोड़ने पर विचार कर रही थी। उन्होंने शीर्ष अदालत को यह भी बताया कि इंडियाबुल्स के पूर्व प्रवर्तक समीर गहलोत लंदन चले गए हैं और मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की जरूरत है।

पीठ ने कहा कि जनवरी के बाद से जांच एजेंसियों ने कोई हलफनामा दाखिल नहीं किया है और एएसजी से पूछा कि मामले में जांच एजेंसियां क्या कर रही हैं।

राजू ने कहा कि जांच जारी है। उन्होंने बताया कि गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआईओ) ने एक मामले की जांच अपने हाथ में ली है, जबकि ईओडब्ल्यू चार मामलों की जांच कर रही है।

एएसजी ने कहा, “मुझे मामले में विस्तृत हलफनामे के साथ स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया जाए।” उन्होंने यह भी कहा कि यह पाया गया है कि सम्मान कैपिटल द्वारा दिए गए सभी ऋण ब्याज सहित पूरी तरह चुका दिए गए हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “जनवरी से जुलाई तक सीबीआई क्या कर रही थी? हम निर्दोष लोगों के खिलाफ जांच नहीं करना चाहते। उन्हें यह कहने का साहस होना चाहिए कि क्योंकि पैसा वापस कर दिया गया, इसलिए कोई अपराध नहीं बनता। ईओडब्ल्यू क्या कर रही थी? क्या उसमें मामले में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का साहस नहीं है? इस मामले में सीबीआई और ईओडब्ल्यू के आचरण पर सवाल खड़े होते हैं।’’

सम्मान कैपिटल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने कहा कि गहलोत की कंपनी में कोई हिस्सेदारी नहीं है और उनका इससे कोई संबंध नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और नलिन कोहली ने भी सिंघवी के साथ पेश होते हुए किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया।

इससे पहले पिछले वर्ष 17 दिसंबर को उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई निदेशक को निर्देश दिया था कि वह एक सप्ताह के भीतर नियमित मामला दर्ज करने पर अंतिम निर्णय लें और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करें।

गैर सरकारी संगठन ने आईएचएफएल के कामकाज में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाया है। उसका दावा है कि कंपनी और उसके तत्कालीन प्रवर्तकों ने बड़े कॉरपोरेट समूहों से जुड़ी संस्थाओं को संदिग्ध ऋण दिए, जिसके बाद कथित तौर पर उक्त धन प्रवर्तकों से जुड़ी कंपनियों के खातों में वापस भेजा गया ताकि उनकी व्यक्तिगत संपत्ति बढ़ सके।

एनजीओ ने बंबई उच्च न्यायालय के 2 फरवरी, 2024 के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें अदालत ने मामले की जांच का आदेश देने से इनकार कर दिया था।

भाषा अमित नेत्रपाल

नेत्रपाल


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