नयी दिल्ली, 26 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 1983 में बिहार में पांच लोगों की हत्या के मामले में दोषियों की सजा को बरकरार रखते हुए मंगलवार को कहा कि इस घटना की क्रूरता ‘‘न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर देती है।’’
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि निचली अदालत के साथ-साथ पटना उच्च न्यायालय ने भी सही कहा है कि इस मामले में ‘‘अनुचित सहानुभूति या नरमी’’ की कोई गुंजाइश नहीं है।
शीर्ष अदालत ने पटना उच्च न्यायालय के अगस्त 2017 के फैसले को चुनौती देने वाले दोषियों की अपील पर अपना फैसला सुनाया।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा इन दोषियों को दी गई सजा और आजीवन कारावास को बरकरार रखा था।
न्यायालय ने उल्लेख किया कि यह घटना मार्च 1983 में मुजफ्फरपुर जिले के एक गांव में हुई थी, जहां कम से कम 58 लोगों की भीड़ ने चंद्र शेखर चौधरी के घर में आग लगा दी थी, जिसके बाद पांच लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई और कई अन्य घायल हो गए।
होली के दिन घातक हथियारों से लैस भीड़ ने चौधरी के घर को घेर लिया था।
पीठ ने कहा, ‘उच्च न्यायालय ने प्रत्येक आरोपी की भूमिका का विस्तृत विवरण दिया है और उन लोगों की पहचान की है जिन्होंने घर में आग लगाई, जिन्होंने भाग रहे पीड़ितों का पीछा किया और जिन्होंने जानलेवा हमले किए।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों से स्पष्ट रूप से यह स्थापित होता है कि आरोपी घातक हथियारों से लैस थे और उन्होंने घर में आग लगाने और चौधरी के परिवार के सदस्यों पर हमले के अपने समान उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए काम किया था।
पीठ ने कहा कि जब अवैध जमावड़े का साझा उद्देश्य सिद्ध हो जाता है, तो उसके प्रत्येक सदस्य उस उद्देश्य को आगे बढ़ाने में किए गए कृत्यों के लिए परोक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराए जाते हैं।
पीठ ने यह भी उल्लेख किया गया कि उच्च न्यायालय के समक्ष अपील के लंबित रहने के दौरान, कई याचिकाकर्ताओं का निधन हो गया और उनके खिलाफ अपील का निपटारा हो गया।
भाषा आशीष पवनेश
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