‘टेलोमियर’ का कैंसर और उम्र संबंधी समस्याओं पर होता है प्रभाव: नोबेल पुरस्कार विजेता जोस्तक

‘टेलोमियर’ का कैंसर और उम्र संबंधी समस्याओं पर होता है प्रभाव: नोबेल पुरस्कार विजेता जोस्तक

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  • Publish Date - January 14, 2026 / 01:38 PM IST,
    Updated On - January 14, 2026 / 01:38 PM IST

(कृष्णा)

नयी दिल्ली, 14 जनवरी (भाषा) तनाव, उम्र संबंधी कारक और कैंसर। इनकी रोकथाम का अभी तक कोई जादुई समाधान नहीं है, लेकिन नोबेल पुरस्कार विजेता जैक जोस्तक के अनुसार इन तीनों के तार ‘टेलोमियर’ से जोड़े जा सकते हैं, जो जीन वाले क्रोमोसोम के अंत में होता है।

विश्व विख्यात वैज्ञानिक जोस्तक के अनुसार इनके बारे में बहुत सी बातें अभी तक नहीं पता हैं, लेकिन कुछ जानकारी है। उनके मुताबिक लंबे समय तक तनाव से टेलोमियर कम हो सकता है जिससे कोशिकाओं का क्षरण हो सकता है और व्यक्ति को उम्र संबंधी समस्याएं होती हैं।

टेलोमियर क्रोमोसोम के सिरों पर मौजूद सुरक्षात्मक संरचनाएं होती हैं, जो कोशिकाओं को विभाजन के दौरान क्षति से बचाती हैं।

जोस्तक ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा, ‘‘एजिंग (बुढ़ापे के लक्षण होना) या कैंसर की समस्याओं का कोई जादुई हल नहीं मिला है, लेकिन अब हम मानते हैं कि टेलोमियर का नियंत्रण दोनों प्रक्रियाओं का जरूरी हिस्सा है।’’

उन्होंने कहा कि टेलोमियर के बारे में आज की जानकारी नोबेल पुरस्कार विजेता इस खोज से मुमकिन हुई है कि टेलोमियर क्रोमोसोम की रक्षा करते हैं।

जोस्तक के साथ यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया की एलिजाबेथ ब्लैकबर्न और जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की कैरल ग्रीडर को इस खोज के लिए 2009 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था।

जोस्तक ने कहा, ‘‘टेलोमियर क्रोमोसोम के सिरों पर पाए जाने वाले खास (जेनेटिक) अनुक्रमण होते हैं, जो बहुत लंबे डीएनए अणु होते हैं। टेलोमियर प्रोटीन के एक पूरे झुंड से लिपटे होते हैं, और वे क्रोमोसोम को सही-सलामत रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। पता चला है कि वे कैंसर और उम्र बढ़ने जैसी चीजों के लिए अहम हैं।’’

यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में रसायन विज्ञान के प्रोफेसर और हरियाणा के सोनीपत में अशोका यूनिवर्सिटी में त्रिवेदी स्कूल ऑफ बायोसाइंसेज के सलाहकार जोस्तक (73) ने हाल में अपने भारत दौरे पर हुई बातचीत में कहा, ‘‘टेलोमियर कैसे विनियमित होते हैं, यह कहना बहुत मुश्किल है और इसे ठीक से समझा नहीं गया है, लेकिन बहुत ज्यादा तनाव जैसी चीज़ों का टेलोमियर पर असर पड़ता है, जिससे वे समय के साथ छोटे होते जाते हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इस वजह से, स्टेम कोशिकाएं विभाजित नहीं हो पातीं और ऊतकों की मरम्मत नहीं हो पाती। इसलिए, टेलोमियर का छोटा होना उम्र बढ़ने की कुछ समस्याओं का एक कारण हो सकता है।’’

जोस्तक लगभग 25 साल से जीवन की शुरुआत के बारे में अध्ययन कर रहे हैं। उनका अनुसंधान प्रांरभिक धरती पर बनने वाली पहली कोशिकाओं, जिन्हें ‘प्रोटोसेल’ कहा जाता है, की प्रकृति को समझने पर विशेष रूप से केंद्रित रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘आबादी के स्तर पर पूरे मानव जीनोम (अनुक्रमण) हमें अनुवांशिक कारणों, प्रतिरोध और अलग-अलग बीमारियों के प्रति संवेदनशीलता के बारे में बहुत सारी जानकारी देते हैं। यह हमें समय के साथ लोगों की आबादी के विस्थापन के बारे में भी गहरी जानकारी देते हैं।’’

उन्होंने कहा कि ‘जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट’ नामक एक परियोजना है जो यह समझने में मदद कर सकती है कि समय के साथ आबादी कैसे उभरी या विकसित हुई।

उन्होंने कहा कि इसका सीधा असर भारतीयों के स्वास्थ्य प्रोफाइल पर पड़ेगा, जो दुनिया की उन जातियों में से हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों सहित अनुवांशिक बीमारियों के प्रति संवेदनशील हैं।

भाषा वैभव मनीषा

मनीषा