बंगाल उपचुनाव से कांग्रेस और तृणमूल के ममता गुट के बीच रिश्तों की दिशा तय होने की संभावना

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बंगाल उपचुनाव से कांग्रेस और तृणमूल के ममता गुट के बीच रिश्तों की दिशा तय होने की संभावना

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  • Publish Date - September 30, 2026 / 05:13 PM IST,
    Updated On - September 30, 2026 / 05:13 PM IST

(प्रदीप्त तापदार)

कोलकाता, 30 सितंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल के दो विधानसभा क्षेत्रों में छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव से कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के ममता बनर्जी नीत गुट के बीच रिश्तों की दिशा तय होने की संभावना है।

ये उपचुनाव बताएंगे कि नंदीग्राम में कांग्रेस और तृणमूल के ममता गुट के बीच हुआ रणनीतिक सहयोग चुनावी समर्थन में तब्दील होता है या नहीं। इनसे यह भी साफ होगा कि रेजीनगर में अलग-अलग चुनाव लड़ने पर दोनों पक्षों को क्या हासिल होता है।

पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए ये उपचुनाव एक रणनीतिक सवाल भी खड़ा करते हैं कि क्या मई में विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की शानदार जीत के बाद तृणमूल कांग्रेस में पड़ी फूट से उबरकर उनके गुट को स्वतंत्र रूप से अपना संगठन खड़ा करना चाहिए। साथ ही संगठन को मजबूत कर राज्य की सियासत में अपनी पारंपरिक जगह वापस हासिल करनी चाहिए या फिर कांग्रेस के साथ तालमेल बनाने रखना चाहिए, जिसका सहयोग सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ वोटों को एकजुट करने में मदद कर सकता है।

पूर्वी मेदिनीपुर के नंदीग्राम में ममता गुट ने संचिता प्रधान डे को मैदान में उतारा था। हालांकि, संचिता मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद उपचुनाव से पीछे हट गईं। इसके बाद ममता ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान के समर्थन की घोषणा की।

ममता ने यह कदम तृणमूल कांग्रेस की पहचान और चुनाव चिह्न पर पार्टी के दोनों गुटों के दावे के बीच निर्वाचन आयोग के उपचुनाव के लिए उन्हें अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए जाने की पृष्ठभूमि में भी उठाया।

ममता ने कांग्रेस उम्मीदवार के समर्थन की घोषणा करते हुए कहा, “हम विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को मजबूत करने के लिए ऐसा कर रहे हैं।”

नंदीग्राम ममता के लिए खास तौर पर मायने रखता है। जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों के जरिये बंगाल की सियासत में उनके उभार में सिंगूर के साथ-साथ नंदीग्राम की भी अहम भूमिका थी। बाद में कांग्रेस-तृणमूल गठबंधन ने 2011 में राज्य में वाम मोर्चे के 34 साल के शासन का अंत कर दिया। हालांकि, एक दशक बाद 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता खुद नंदीग्राम में शुभेंदु से हार गईं।

ऐसे में मौजूदा मुकाबले ने ममता की राजनीतिक विरासत, उनके गुट के भविष्य और पश्चिम बंगाल में विपक्ष के व्यापक समीकरण से जुड़े सवालों को एक साथ ला खड़ा किया है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि तृणमूल नेतृत्व ने उपचुनाव कार्यक्रम घोषित होने से पहले, सितंबर की शुरुआत में कांग्रेस आलाकमान से संपर्क किया था और प्रस्ताव दिया था कि कांग्रेस नंदीग्राम से चुनाव लड़े तथा तृणमूल रेजीनगर से।

भट्टाचार्य के मुताबिक, “पार्टी आलाकमान ने समय मांगा और बाद में प्रस्ताव पर राज्य के नेताओं से सलाह-मशविरा किया।” उन्होंने कहा कि राज्य के नेता इस नतीजे पर पहुंचे कि “यह तृणमूल के साथ गठबंधन करने का सही समय नहीं है।”

इसके बाद कांग्रेस ने दोनों सीट पर अपने उम्मीदवार घोषित किए।

पार्टी प्रवक्ता सुमन रॉय चौधरी ने कहा कि तृणमूल का प्रस्ताव उसकी राजनीतिक हताशा का संकेत था।

उन्होंने कहा, “जब तृणमूल सत्ता में थी, तो उसने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया। तब भी नहीं, जब भाजपा के खिलाफ मिलकर लड़ने की संभावना थी। अब जब वह हार चुकी है और अकेली पड़ गई है, तो उसे कांग्रेस की अहमियत का एहसास हो रहा है।”

यह राय पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के सामने एक बड़ी दुविधा को दिखाती है। राज्य में अपने 15 साल के शासन के दौरान तृणमूल ने कांग्रेस के लगभग 56 विधायकों को पार्टी में शामिल कर लिया, जिससे कांग्रेस का संगठनात्मक आधार और कमजोर हो गया।

हालांकि, तृणमूल के एक नेता ने इस बात से इनकार किया कि कांग्रेस आलाकमान के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव रखा गया था।

कांग्रेस की बंगाल इकाई के पूर्व अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने भी सुमन रॉय चौधरी की बात का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “हमारी पार्टी को पश्चिम बंगाल में अपने संगठन को फिर से मजबूत करना होगा। चूंकि, ममता बनर्जी विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं और उनकी पार्टी में भी फूट पड़ गई है, इसलिए अब वह कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहती हैं, जबकि पिछले 15 वर्षों में उन्होंने कांग्रेस को खत्म करने की कोशिश की थी।”

हालांकि, कांग्रेस का एक धड़ा इस गणित को अलग नजरिये से देखता है। उसका तर्क है कि जिन चुनाव क्षेत्रों में दोनों पार्टियों का समर्थन आधार एक जैसा है, वहां रणनीतिक सहयोग से भाजपा-विरोधी और अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट किया जा सकता है।

प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “सवाल किसी स्थायी गठबंधन का नहीं है। जहां भी भाजपा-विरोधी वोटों को एकजुट करने की संभावना है, वहां हमें देखना होगा कि रणनीतिक सहयोग से मदद मिल सकती है या नहीं।”

हालांकि, कांग्रेस में तृणमूल के साथ किसी भी तरह के संभावित समझौते का जबरदस्त विरोध हो रहा है।

कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता ने कहा, “पश्चिम बंगाल में तृणमूल ही भाजपा की सबसे बड़ी समर्थक रही है। तृणमूल की वजह से ही पिछले कुछ वर्षों में राज्य में कांग्रेस कमजोर हुई है। तृणमूल के साथ गठबंधन करना आत्मघाती कदम होगा।”

रेजीनगर में कांग्रेस और ममता गुट अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं, जिससे यह सीट इस बात की परीक्षा बनकर उभरी है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के समर्थन के बिना कितने वोट जुटा सकते हैं।

कांग्रेस के लिए यह मुकाबला दिखाएगा कि क्या वह तृणमूल के समर्थन के बिना अपना जनाधार बढ़ा सकती है, जबकि ममता को इससे शुरुआती संकेत मिल सकता है कि उनका गुट पार्टी के लोकप्रिय नाम और चुनाव चिह्न को खोने के बावजूद अपना पारंपरिक जनाधान बनाए रख सकता है या नहीं।

तृणमलू कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “रेजीनगर में हमारी लड़ाई दिखाएगी कि पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर हुए विवाद के बावजूद हमारे समर्थक हमारे साथ बने रहते हैं या नहीं।”

बंगाल कांग्रेस के एक नेता ने कहा, “नंदीग्राम एक प्रयोग है। अगर तृणमूल के पारंपरिक मतदाता वाकई कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करते हैं, तो इससे पता चलेगा कि सहयोग का चुनावी मतलब राजनीतिक बयानबाजी से कहीं ज्यादा है।”

ममता को उपचुनाव के नतीजों से इस सवाल का जवाब मिल सकता है कि क्या कांग्रेस कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में एक उपयोगी रणनीतिक सहयोगी साबित हो सकती है, या फिर उनके गुट को पार्टी पर निर्भर रहे बिना अपना चुनावी आधार फिर से खड़ा करना चाहिए।

चुनाव विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, “नतीजों से कारण-प्रभाव का संबंध तो साबित नहीं होगा, लेकिन ये दोनों पार्टियों के अंदर चल रही बहस पर असर डाल सकते हैं।”

नौ अक्टूबर के नतीजे भले ही कांग्रेस-तृणमूल गठबंधन के सवाल को पूरी तरह न सुलझाएं, लेकिन ये उस बहस की दिशा जरूर तय कर सकते हैं, जो आगे इस मुद्दे पर होगी।

भाषा पारुल पवनेश

पवनेश