नयी दिल्ली, आठ अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को केंद्र से उन दो याचिकाओं पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा, जिनमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जो किसी व्यक्ति के लैंगिक पहचान के स्वनिर्धारण के अधिकार को छीन लेते हैं।
मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने चंद्रेश जैन और लक्ष्य जैन की याचिकाओं पर नोटिस जारी कर केंद्र सरकार से छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है।
यह विधेयक संसद द्वारा 25 मार्च को पारित किया गया और 30 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे अपनी मंजूरी दे दी।
याचिकाकर्ता चंद्रेश जैन ने कहा कि यह अधिनियम लैंगिक पहचान के स्वनिर्धारण को ‘‘हटाता और कमजोर करता है’’ तथा इसके बजाय लैंगिक पहचान के राज्य-नियंत्रित सत्यापन, प्रमाणीकरण और ‘स्क्रीनिंग’ की एक व्यवस्था शुरू करता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा, गोपनीयता और निर्णय लेने की स्वायत्तता के अधिकारों का उल्लंघन है।
उनकी याचिका में कहा गया है कि संशोधन अधिनियम स्पष्ट रूप से मनमाना और असंगत है तथा यह लैंगिक पहचान की अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित करके अनुच्छेद 19(1)(ए) का उल्लंघन करता है।
लक्ष्य जैन की याचिका में कहा गया है कि संशोधन अधिनियम ने लैंगिक पहचान के स्वनिर्धारण को चिकित्सा और प्रशासनिक सत्यापन की व्यवस्था से प्रतिस्थापित करके मौजूदा वैधानिक ढांचे को बदल दिया है, जिसमें जिलाधिकारी (डीएम) द्वारा जांच भी शामिल है।
उनकी याचिका में कहा गया है कि ऐसी आवश्यकता स्पष्ट रूप से ‘राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ’ मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून का उल्लंघन है, जिसमें यह माना गया था कि लैंगिक पहचान आत्म-पहचान का मामला है और मनोवैज्ञानिक पहचान को जैविक गुणों पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
चंद्रेश जैन की याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि उच्चतम न्यायालय पहले ही यह मान चुका है कि लैंगिक पहचान अनुच्छेद 14, 19(1)(ए) और 21 के तहत गरिमा, स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है और प्रत्येक व्यक्ति को लैंगिक पहचान के स्वनिर्धारण का अधिकार है।
इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को होगी।
भाषा शुभम सुरेश
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