गुंडा एक्ट का दमन के साधन के तौर पर किया जा रहा इस्तेमाल

गुंडा एक्ट का दमन के साधन के तौर पर किया जा रहा इस्तेमाल

गुंडा एक्ट का दमन के साधन के तौर पर किया जा रहा इस्तेमाल
Modified Date: September 16, 2026 / 09:18 pm IST
Published Date: September 16, 2026 9:18 pm IST

प्रयागराज (उप्र), 16 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि उत्तर प्रदेश गुंडा अधिनियम का उपयोग राज्य के नौकरशाहों और सरकार द्वारा दमन के साधन के तौर पर किया जा रहा है, जबकि अदालत ने इस मुद्दे पर निरंतर कई निर्णय दिए हैं।

उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता अभिषेक त्यागी को 50,000 रुपये क्षतिपूर्ति के तौर पर दिए जाने का आदेश दिया। त्यागी के खिलाफ गुंडा अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू की गई थी।

उच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार यह क्षतिपूर्ति संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूल करने के लिए स्वतंत्र है।

न्यायमूर्ति संदीप जैन ने कहा कि नौकरशाहों को अवैध और मनमाना आदेश जारी करना बंद करना होगा अन्यथा उन्हें दंडात्मक हर्जाने का सामना करना पड़ेगा।

न्यायमूर्ति जैन ने 10 सितंबर को अपने आदेश में अभिषेक त्यागी द्वारा दायर याचिका स्वीकार कर ली। त्यागी ने अपने खिलाफ उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय ने गाजियाबाद के सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) और मेरठ मंडल के आयुक्त के आदेशों को रद्द कर दिया।

त्यागी के खिलाफ दो आपराधिक मामलों को आधार बनाते हुए गुंडा अधिनियम के तहत कार्यवाही की गई थी। गाजियाबाद के एसीपी ने 18 सितंबर, 2025 को जारी आदेश के तहत त्यागी को अपने स्थायी पते पर रहने और संबंधित पुलिस थाने पर छह महीने तक प्रत्येक दूसरे और चौथे शनिवार को हाजिरी लगाने का निर्देश दिया था।

इस आदेश के खिलाफ त्यागी की अपील 10 दिसंबर, 2025 को मेरठ मंडल के आयुक्त द्वारा खारिज कर दी गई थी।

उच्च न्यायालय ने कहा कि महज एक या दो मामलों के आधार पर एक व्यक्ति को गुंडा नहीं कहा जा सकता, इस रुख के बावजूद नौकरशाही ने जानबूझकर इसे नजरअंदाज किया और निरंतर विपरीत आदेश पारित कर रही है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि इसके अलावा, दो आपराधिक मामलों के बीच तीन साल का अंतर है जिससे पता चलता है कि वह एक आदतन अपराधी नहीं है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि इससे यह स्पष्ट है कि 1970 के अधिनियम का नौकरशाही और सरकार द्वारा दमन के साधन के तौर पर उपयोग किया जा रहा है जो इस कानून के उद्देश्यों के विपरीत है।

भाषा सं राजेंद्र

राजकुमार

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