काशी का इतिहास 12वीं शताब्दी से भी पुराना है: मीनाक्षी जैन

काशी का इतिहास 12वीं शताब्दी से भी पुराना है: मीनाक्षी जैन

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  • Publish Date - January 10, 2026 / 08:11 PM IST,
    Updated On - January 10, 2026 / 08:11 PM IST

मंगलुरु (कर्नाटक), 10 जनवरी (भाषा) प्रख्यात इतिहासकार और पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर मीनाक्षी जैन ने शनिवार को कहा कि काशी का इतिहास मध्यकाल तक सीमित नहीं रखा जा सकता क्योंकि इस प्राचीन नगर का संदर्भ उपनिषदों में पाया जाता है और ‘इसका अतीत इसके मंदिरों की दीवारों पर अंकित है।’

यहां आठवें मंगलुरु साहित्य उत्सव के संवाद सत्र के दौरान डाक्टर जैन काशी और मथुरा में मंदिर स्थलों को लेकर चल रहे विवादों के संबंध में सवालों का जवाब दे रही थीं।

उन्होंने कहा कि लोकप्रिय कथाओं में 12वीं शताब्दी से पूर्व के ऐतिहासिक साक्ष्य को नजरअंदाज किया गया।

उन्होंने कहा, ‘‘काशी का इतिहास अक्सर केवल 12वीं शताब्दी से माना जाता है जोकि गलत है। यह नगर उपनिषद काल से अस्तित्व में है। अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान भी जब वहां भूमि के वक्फ की होने का दावा करते हुए 1936 में एक मुकदमा दायर किया गया था, तो एक विस्तृत जांच कराई गई थी। ब्रिटेन के अधिकारियों ने 35 स्थानीय निवासियों का साक्षात्कार कर करीब 4,000 पेज की रिपोर्ट तैयार की थी।”

मथुरा को लेकर उन्होंने कहा कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल द्वारा 1968 में उस मंदिर के लिए 13.3 एकड़ भूमि निर्धारित की गई थी और ईदगाह मैदान के लिए तीन एकड़ भूमि आवंटित की गई थी।

जैन ने कहा, “दशकों तक इन मुद्दों के बारे में लिखना या बोलना संभव नहीं था। वर्ष 2010 से पूर्व, प्रकाशक भारतीय इतिहास पर लिखी किताबें छापने से हिचकिचाते थे।”

जैन ने कहा कि अपने जीवनकाल में उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर बनने की कभी कल्पना नहीं की थी।

“हमारी सभ्यतागत विरासत से पुनः जुड़ना विषय” पर बोलते हुए जैन ने भारतीय सभ्यता के अस्तित्व में बने रहने का श्रेय शासकों के बजाय आम लोगों की आस्था और उनकी जीवटता को दिया।

उन्होंने सांची से प्राप्त शिलालेखों का हवाला दिया जहां धार्मिक ढांचों के लिए ज्यादातर दान राजाओं के बजाय आम नागरिकों- बढ़ई, गाड़ी खींचने वालों और आम महिलाओं की ओर से आया।

उन्होंने कहा, “हमारी पाठ्य पुस्तकों ने हमें सिखाया है कि हम हमेशा विभाजित रहें। हिंदू, जैन और बौद्ध लोग ज्यादातर संघर्ष में थे। यह कहानी बांटों और राज करो की अंग्रेजों की नीति के तहत गढ़ी गई। भारतीय इतिहास को स्वदेशी दृष्टिकोण से समझा जाना आवश्यक है।”

भाषा सं राजेंद्र

संतोष

संतोष