भारतीय राजनीति के ताने-बाने में रची-बसी है अनशन की विरासत

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भारतीय राजनीति के ताने-बाने में रची-बसी है अनशन की विरासत

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  • Publish Date - July 17, 2026 / 07:07 PM IST,
    Updated On - July 17, 2026 / 07:07 PM IST

(मनीष सैन)

नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) महात्मा गांधी, भगत सिंह, पी. श्रीरामुलु, इरोम शर्मिला, अन्ना हजारे… और अब सोनम वांगचुक। यह सूची लंबी है, वजहें अलग-अलग हैं, लेकिन विरोध जताने और अपनी बात सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने का तरीका एक ही है- अनशन करना।

अनशन कुछ दिनों से लेकर 16 साल तक होता रहा है। अलग-अलग स्तर की कई भूख हड़तालें, जो समय की गर्त दब गयीं। इन्होंने उस देश के दिल को छू लिया है जो अन्याय के खिलाफ विरोध के तरीके के तौर पर अनशन करने की अपनी विरासत पर गर्व करता है।

परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों को लेकर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के साथ एकजुटता दिखा रहे वांगचुक की हड़ताल का शुक्रवार को 20वां दिन है। इस बीच, लोगों का ध्यान दिल्ली के जंतर-मंतर की ओर गया, जहां सैकड़ों लोग वांगचुक और उनके साथ अनशन कर रहे अन्य विद्यार्थियों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए जमा हो रहे थे।

वांगचुक का आमरण अनशन समसामयिक भारतीय इतिहास में भूख हड़ताल की उस परंपरा का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत गांधीजी ने की थी। और उस कड़ी में इरोम शर्मिला भी शामिल हैं।

इरोम शर्मिला ने ‘सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम ‘ (अफस्पा) के विरोध में 16 साल तक अन्न-जल त्याग दिया था। दुनिया में सबसे लंबी भूख हड़ताल का रिकॉर्ड उनके नाम है।

गांधी ने कहा था, “…एक ऐसा उपवास जिसे अहिंसा का अनुयायी कभी-कभी समाज द्वारा किए गए किसी गलत काम का विरोध करने के लिए मजबूर महसूस करता है। वह ऐसा तब करता है जब अहिंसा के अनुयायी के तौर पर उसके पास कोई और रास्ता नहीं बचता। मेरे सामने भी ऐसा ही मौका आया है।”

विरोध के तरीके के तौर पर उपवास के सबसे बड़े समर्थकों में से एक, गांधी ने अपने 18 उपवासों में से आखिरी उपवास से पहले देश भर में सांप्रदायिक शांति बहाल करने के लिए 13 जनवरी, 1948 को बिड़ला हाउस से यह बात लिखी थी। दो सप्ताह बाद, उसी जगह पर उनकी हत्या कर दी गई।

उन्होंने हरिजन में लिखा, ‘‘मुझे कभी भी स्वयं को असहाय (संसाधनों या उपायों से वंचित) महसूस करना पसंद नहीं है। एक सत्याग्रही को भी कभी ऐसा नहीं महसूस करना चाहिए। सत्याग्रही के लिए उपवास (अनशन) अंतिम उपाय होता है, जैसे हिंसक व्यक्ति के लिए तलवार अंतिम हथियार होती है—चाहे वह अपनी तलवार हो या किसी और की।’’

राष्ट्रपिता गांधी ने अलग-अलग वजहों से 18 बार उपवास किया। इसकी शुरुआत दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स में आश्रम के लोगों के प्रायश्चित के तौर पर सात दिन के उपवास से हुई, जिसके बाद आश्रम में ही इसी तरह की वजहों से एक दिन का उपवास रखा गया।

उनका सबसे लंबा उपवास 21 दिन तक चला। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता, छुआछूत के खिलाफ और बिना किसी आरोप के अंग्रेजों द्वारा हिरासत में लिए जाने के विरोध में अलग-अलग अवधि के लिए उपवास किया।

गांधीजी के भूख हड़ताल के विचार का उनके अनुयायियों पर गहरा असर पड़ा, जिनमें स्वतंत्रता सेनानी पी श्रीरामुलु सबसे प्रमुख थे।

गांधीजी के इन पक्के अनुयायी ने आंध्र राज्य के गठन में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने अक्टूबर 1952 में तेलुगु भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य की मांग करते हुए भूख हड़ताल शुरू की; प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस मांग का विरोध किया था। उनका 58वें दिन निधन हो गया।

उसके बाद उस इलाके में हिंसक विरोध-प्रदर्शन भड़क उठा, जिससे सरकार को उस जमीन की रूपरेखा तैयार करनी पड़ी जिसे बाद में आंध्र प्रदेश के नाम से जाना गया।

श्रीरामुलु ने अपनी मौत के ज़रिए, भूख हड़ताल के अपने पक्के संकल्प से देश का नक्शा बदल दिया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर अजय गुडावर्थी के अनुसार, गांधीजी उपवास को सिर्फ़ सरकार पर दबाव बनाने का ज़रिया नहीं मानते थे।

उन्होंने कहा, ‘‘.. वह इसे खुद के इरादों को साफ करने के लिए आत्म-शुद्धि का एक तरीका भी मानते थे। और उनका मानना ​​था कि बहस से इरादे साफ नहीं होते, बल्कि तकलीफ सहने की तैयारी से होते हैं।”

स्वतंत्रता से पहले के देश में भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और जतींद्रनाथ दास को 1929 में जेल की हालत सुधारने के लिए भूख हड़ताल करने के लिए याद किया जाता है। उन्हें जॉन सॉन्डर्स की हत्या के मामले में जेल में रखा गया था।

उन्होंने मांग की कि उन्हें राजनीतिक कैदियों का दर्जा दिया जाए और खाने-पीने, कपड़ों, साफ-सफाई से जुड़ी रोजमर्रा की चीजें और किताबें एवं अखबार मिलने के मामले में उनसे बराबरी का व्यवहार किया जाए।

दास 63 दिनों के अनशन के बाद चल बसे।

सिंह ने 116 दिनों बाद अपना अनशन तोड़ा, लेकिन ऐसा उन्होंने दूसरे भारतीय कैदियों के लिए जेल में अहम सुधार सुनिश्चित करने के बाद ही किया।

हाल के समय में, मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने पांच नवंबर, 2000 को अपनी भूख हड़ताल शुरू की थी। नौ अगस्त, 2016 को अपना अनशन खत्म करने से पहले उन्हें भारत के अलग-अलग राज्यों में कई बार गिरफ़्तार किया गया था। उन्होंने ‘अफस्पा’ के बारे में राजनीतिक अलख जगायी लेकिन अपनी मूल मांगे मंगवाने में वह विफल रहीं। अगले साल वह चुनाव में उतरीं लेकिन उन्हें 100 से भी कम वोट मिले।

भ्रष्टाचार-रोधी कानून बनाने की मांग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे अगस्त 2011 में दिल्ली में भूख हड़ताल पर बैठे थे।

यह भूख हड़ताल 11 दिनों तक चली। इसने लोगों की भावनाओं को इस तरह से झकझोरा, जैसा हाल के वर्षों में पहले कभी नहीं देखा गया था।

अब ‘कॉजपा’ के प्रदर्शन में बैठे शिक्षाविद और जलवायु कार्यकर्ता वांगचुक की हालत हर घंटे कमज़ोर होती जा रही है, लेकिन उन्होंने कहा है कि वह ‘किसी भी कीमत पर 20 जुलाई तक ज़िंदा रहेंगे’। इसी दिन कॉजपा ने संसद तक विरोध मार्च निकालने की योजना बनाई है।

कॉजपा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े और उन विद्यार्थियों के परिवारों के लिए एक करोड़ रुपये के मुआवज़े की मांग कर रही है, जिनकी कथित तौर पर परीक्षा में गड़बड़ियों के कारण आत्महत्या से मौत हुई थी।

कुछ ही वर्ष पहले पर्यावरणविद् जी डी अग्रवाल ने गंगा नदी के अविरल प्रवाह तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाओं को बंद करने की मांग पर 111 दिन का अनशन किया था। इस अनशन के कारण 2018 में 68 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

भाषा राजकुमार माधव

माधव