नयी दिल्ली, चार अगस्त (भाषा) नया उपन्यास ‘‘द रेनबो रनर्स’’ असम राज्य में उग्रवाद और उग्रवाद रोधी कार्रवाई का उल्लेख एक साधारण युवक के नजरिये से किया गया है।
ध्रुवज्योति बोरा का नया उपन्यास ‘‘द रेनबो रनर्स’’ (लेखक ने अपने असमिया उपन्यास ‘अर्थ’ से स्वयं ही अनुवाद किया है) उनकी ‘‘कालांतरार’’ का तीसरा एवं अंतिम भाग है। इससे पहले उनके दो उपन्यास ‘‘कालांतरार गद्य’ और ‘तेजोर अंधार’ हैं।
इस तीसरे भाग में बोरा ने वर्तमान असम की वास्तविकता की गहन पड़ताल की है। असम में तीन दशक से अधिक समय तक बड़े पैमाने पर हिंसा देखी गयी। उग्रवादियों द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन, अपहरण, फिरौती, रंगदारी बेरोकटोक जारी रहा।
उपन्यास में श्रीमन नाम के एक साधारण युवक की कहानी है जो उस समय गुवाहाटी में रहता था जब असम में उग्रवादियों के कारण अशांति और उग्रवाद रोधी अभियान जोरों पर था। हत्या, अपहरण और रंगदारी आम बात हो गई थी। श्रीमन ने जब एक के बाद एक दिल दहला देने वाली घटनाएं देखीं तो उसके मन में भय व्याप्त हो गया। श्रीमन इस तरह से भयभीत हुआ कि वह अपने राज किसी के साथ साझा भी नहीं कर पा रहा था। इसके बाद वह पत्रकारिता की दुनिया में पहुंच गया।
‘नियोगी बुक्स’ द्वारा प्रकाशित दो भागों वाले उपन्यास के दूसरे भाग में कहानी अचानक मनोरम और भव्य हिमालय की ओर मुड़ जाती है, जिसमें धौलाधार पर्वतों में ट्रैकिंग करने वाले दो व्यक्तियों का जिक्र किया गया है।
लेखक ने पाठकों का ध्यान मैकलोडगंज में तिब्बती शरणार्थियों के अनिश्चित भाग्य की ओर भी आकर्षित किया है।
भाषा खारी अमित
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