‘दलबदलुओं को नकारें’ का नारा देने वाला दल तृणमूल के बागी सांसदों के विलय से सुर्खियों में आया

‘दलबदलुओं को नकारें’ का नारा देने वाला दल तृणमूल के बागी सांसदों के विलय से सुर्खियों में आया

‘दलबदलुओं को नकारें’ का नारा देने वाला दल तृणमूल के बागी सांसदों के विलय से सुर्खियों में आया
Modified Date: June 15, 2026 / 12:46 pm IST
Published Date: June 15, 2026 12:46 pm IST

नयी दिल्ली, 15 जून (भाषा) ‘अपने अधिकारों की रक्षा के लिए दलबदलुओं को नकारें’ के नारे के साथ 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में लगभग गुमनामी के बीच चुनाव लड़ने वाला एक राजनीतिक दल रविवार को उस वक्त अचानक राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया जब तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों वाले बागी गुट ने एनसीपीआई में विलय का ऐलान किया।

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) नामक इस दल ने त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार उम्मीदवार उतारने की घोषणा की थी, लेकिन अंततः उसके प्रत्याशी चावमानु, अंबासा और कैलाशहर सीटों पर ही मैदान में उतर सके। चुनावी नतीजों में पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा और उसके उम्मीदवार या तो ‘नोटा’ (इनमें से कोई नहीं) से पीछे रहे या उससे मामूली अंतर से आगे निकल पाए।

करमचारा सीट से पार्टी की उम्मीदवार रीता शिल हलाम का नामांकन जांच के दौरान खारिज कर दिया गया था।

दिलचस्प तथ्य यह है कि एनसीपीआई का पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा में है। निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में शेउली कुंडू का नाम पार्टी की अध्यक्ष के रूप में दर्ज हैं, जो स्वयं को कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता बताती हैं।

एनसीपीआई के प्रचार पोस्टर पर मतदाताओं से पार्टी के चुनाव चिह्न ‘पेन की निब’ पर मतदान करने की अपील करते हुए संदेश लिखा था, ‘‘अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें। राजनीतिक हस्तियों के बजाय समाजसेवियों का समर्थन करें।’’

पार्टी को यह चुनाव चिह्न एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में आवंटित किया गया था।

रविवार को जब ‘पीटीआई-भाषा’ ने चावमानु से पार्टी के उम्मीदवार रहे बरजेदा त्रिपुरा से संपर्क किया, तो वह खुद इस घटनाक्रम से हैरान नजर आए।

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने 2023 में चुनाव लड़ा था। अब तीन साल बाद यह सब कैसे हो गया?’’

लोकसभा के 20 सदस्यों के एनसीपीआई में विलय की खबर सुनकर बरजेदा को यकीन नहीं हुआ। उन्हें आश्चर्य था कि जिस पार्टी का नाम अब राष्ट्रीय राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है, उसी ने कभी उन्हें त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया था।

बरजेदा ने बताया कि वह दिहाड़ी मजदूर हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘2023 में कृष्ण देबबर्मा नाम के एक व्यक्ति ने मुझसे संपर्क किया था। उसी के कहने पर मैंने चुनाव लड़ा। कई वर्ष पहले मैं कांग्रेस का समर्थक था।’’

हालांकि, कृष्ण देबबर्मा से संपर्क नहीं हो सका।

बरजेदा के चुनावी हलफनामे के अनुसार, 2023 में उनकी आयु 62 वर्ष थी। उन्होंने आठवीं तक शिक्षा प्राप्त की थी, चार लाख रुपये की संपत्ति घोषित की थी और अपने पेशे के तौर पर, समाजसेवा से जुड़े होने का उल्लेख किया था।

चावमानु सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शंभू लाल चकमा विजयी रहे थे। उन्होंने टिपरा मोथा के हांगसा कुमार त्रिपुरा को 2,899 मतों के अंतर से हराया था। बरजेदा 536 वोट के साथ पांचवें स्थान पर रहे और ‘नोटा’ पर डले 500 वोट से मामूली अंतर से आगे रहे।

पार्टी के अन्य उम्मीदवार अंबासा, करमचारा और कैलाशहर सीटों से मैदान में थे। इनमें करमचारा और अंबासा सीट टिपरा मोथा के खाते में गईं, जबकि कैलाशहर से कांग्रेस ने जीत दर्ज की।

इस बीच, तृणमूल कांग्रेस में बगावत रविवार को उस वक्त निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई जब बागी सांसदों ने एनसीपीआई में विलय का ऐलान किया और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की।

लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया कि तृणमूण के दो-तिहाई लोकसभा सांसदों ने अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग करते हुए पत्र सौंप दिया है।

उन्होंने कहा, ‘‘तृणमूल के दो-तिहाई सांसदों ने अलग बैठने की व्यवस्था के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र दिया है। हम नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय करेंगे और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का समर्थन करेंगे।’’

वहीं, तृणमूल के वरिष्ठ नेता एवं लोकसभा सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि असंतुष्ट गुट पहले ही एनसीपीआई में विलय कर चुका है। उन्होंने एनसीपीआई को एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल बताया।

निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल वे होते हैं, जो आयोग में पंजीकृत तो होते हैं लेकिन अभी राज्य या राष्ट्रीय दल का दर्जा हासिल करने के लिए आवश्यक मानदंड पूरे नहीं कर पाए हैं।

भाषा खारी मनीषा

मनीषा


लेखक के बारे में