संसदीय समिति की बैठक में उठा यूपीआई शुल्क का विषय, विपक्ष ने ‘जनविरोधी’ बताया

संसदीय समिति की बैठक में उठा यूपीआई शुल्क का विषय, विपक्ष ने ‘जनविरोधी’ बताया

संसदीय समिति की बैठक में उठा यूपीआई शुल्क का विषय, विपक्ष ने ‘जनविरोधी’ बताया
Modified Date: September 16, 2026 / 07:41 pm IST
Published Date: September 16, 2026 7:41 pm IST

नयी दिल्ली, 16 सितंबर (भाषा) संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की बैठक में बुधवार को विपक्षी सदस्यों ने व्यापारिक यूपीआई लेनदेन पर शुल्क की व्यवस्था पर चिंता जताई और कहा कि इस ‘जनविरोधी फैसले’ का पूरे देश में असर होगा तथा इसको लेकर लोगों में आक्रोश है।

कुछ विपक्षी सदस्यों ने समिति की बैठक में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर की गणना के लिए अपनाई गई पद्धति को लेकर भी चिंता जताई। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई है।

बैठक के बाद समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब ने बताया कि यूपीआई का मुद्दा बुधवार की बैठक की कार्यवाही का हिस्सा नहीं था, लेकिन सदस्यों ने इस संबंध में चिंताएं व्यक्त कीं।

उन्होंने कहा कि अक्टूबर में नई समिति के अस्तित्व में आने के बाद इस मुद्दे पर विचार किया जा सकता है।

समिति के सदस्य और आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने कहा कि 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक भुगतान पर शुल्क लगाने के सरकार के फैसले से देश की पूरी आबादी प्रभावित होगी।

प्रेमचंद्रन ने कहा, ‘‘यह पूरी तरह जनविरोधी फैसला है।’’

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि संसदीय समितियों की कार्यवाही विशेषाधिकार प्राप्त होती है और उस पर टिप्पणी करना उचित नहीं है, लेकिन यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने की आशंका को लेकर देशभर में चिंता और नाराजगी है तथा ऐसे मुद्दे संसदीय कार्यवाही में भी उठते हैं।

तिवारी ने कहा, ‘‘यूपीआई और इस तथ्य को लेकर कि लेनदेन शुल्क लगाया जाने वाला है, पूरे देश में चिंता और आक्रोश है। जाहिर तौर पर, जो बात देश की जनता को परेशान करती है, उसका प्रतिबिंब और उल्लेख संसदीय कार्यवाही में भी होता है।’’

सरकार ने मंगलवार को बड़े डिजिटल भुगतान के लिए जारी नई व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पाने पर व्यापारियों से 0.4 प्रतिशत का एमडीआर शुल्क लेना तय किया। इसमें 75,000 रुपये या उससे अधिक के भुगतान पर अधिकतम शुल्क 300 रुपये होगा।

इसके साथ जनवरी, 2020 से लागू शून्य-एमडीआर व्यवस्था समाप्त हो गई है। इस व्यवस्था को डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए लागू किया गया था, लेकिन बैंक और वित्तीय-प्रौद्योगिकी (फिनटेक) कंपनियां लंबे समय से इस पर सवाल उठा रही थीं।

आधिकारिक बयान के मुताबिक, नए बदलाव 15 अक्टूबर, 2026 से प्रभावी हो जाएंगे।

जीडीपी की गणना के मुद्दे पर तिवारी ने कहा कि सरकार को जीडीपी की गणना की पद्धति स्पष्ट करनी चाहिए, क्योंकि उसने आधार वर्ष में बदलाव किया है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब आप आधार वर्ष बदलते हैं तो आपने कौन से सूचकांक हटा दिए हैं? कौन से नए मानदंड जोड़े हैं? इसलिए स्पष्ट रूप से सरकार को जीडीपी की गणना की पद्धति समझानी चाहिए, क्योंकि पहली तिमाही के जीडीपी के सही अनुमान को लेकर काफी चिंता है।’’

सरकार द्वारा 31 अगस्त को जारी आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी, जबकि एक वर्ष पहले इसी अवधि में वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत थी।

विपक्ष जीडीपी वृद्धि दर की गणना में अपनाई गई पद्धति पर सवाल उठाता रहा है और उस पर ‘‘आंकड़ों में हेरफेर’’ का आरोप लगाता रहा है। संसदीय समिति की बैठक में ‘वर्चुअल डिजिटल एसेट्स’ के मुद्दे पर भी चर्चा हुई।

महताब ने कहा कि समिति पिछले करीब एक वर्ष से इस विषय पर विभिन्न हितधारकों के साथ चर्चा कर रही है और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई), केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) सहित अन्य पक्षों के साथ विचार-विमर्श कर चुकी है।

उन्होंने कहा कि समिति के समक्ष मूल सवाल यह है कि सरकार ‘वर्चुअल डिजिटल एसेट्स’ को स्वीकार नहीं कर रही है और न ही उन्हें विनियमित करना चाहती है, लेकिन नियमन नहीं होने से विभिन्न प्रकार की गतिविधियों के लिए अधिक गुंजाइश पैदा हो रही है।

भाषा हक हक गोला

गोला


लेखक के बारे में