उत्तराखंड सरकार वन भूमि पर अवैध निर्माणों का ब्योरा देने वाली रिपोर्ट दाखिल करे: उच्चतम न्यायालय

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उत्तराखंड सरकार वन भूमि पर अवैध निर्माणों का ब्योरा देने वाली रिपोर्ट दाखिल करे: उच्चतम न्यायालय

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  • Publish Date - January 5, 2026 / 09:09 PM IST,
    Updated On - January 5, 2026 / 09:09 PM IST

नयी दिल्ली, पांच जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने उत्तराखंड में वन भूमि पर बड़े पैमाने पर अवैध निर्माणों पर गंभीर चिंता जताते हुए सोमवार को कहा कि राज्य के अधिकारियों ने इस मुद्दे को “लगातार नजरअंदाज” किया है।

शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड सरकार को राज्य में वन भूमि पर किए गए अवैध निर्माणों के संबंध में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें ऐसे निर्माणों का अनुमानित ब्योरा देने वाला स्थल नक्शा भी शामिल होना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने उत्तराखंड में वन भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण पर 22 दिसंबर को गंभीर चिंता जताई थी। उसने वन भूमि की रक्षा करने में राज्य सरकार की कथित विफलता की जांच के लिए स्वत: ही कार्यवाही का दायरा बढ़ाने की बात कही थी।

पीठ ने कहा कि राज्य के अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से जमीन हड़पने वालों के साथ मिलीभगत करके, पहले सरकारी जमीन पर अतिक्रमण की अनुमति दी और फिर अदालती आदेशों की आड़ में खुद को पाक-साफ साबित करना चाह रहे हैं।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि राज्य के अधिकारी इस मुद्दे को लगातार नजरअंदाज करते आए हैं और “यह भूमि हड़पने वालों के साथ मिलीभगत और साठगांठ का मामला प्रतीत होता है।”

पीठ ने कहा, “हम यह जानना चाहते हैं कि वन भूमि पर किस हद तक अतिक्रमण किया गया है… यह पता लगाना आवश्यक है कि क्या अधिकारियों की ओर से कोई मौन समर्थन हासिल था।”

उसने कहा, “दो हफ्ते के भीतर एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जाए और उसमें अवैध निर्माणों का अनुमानित विवरण और ऐसे निर्माणों की प्रकृति का ब्योरा देने वाला स्थल नक्शा शामिल होना चाहिए।”

पीठ ने अनीता कांडवाल की ओर से उत्तराखंड सरकार और उसके अधिकारियों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकारी वन भूमि के रूप में अधिसूचित लगभग 2,866 एकड़ भूमि पर निजी व्यक्तियों के कब्जा करने का अनुमान है।

जानकारी के मुताबिक, इस वन भूमि का एक हिस्सा ऋषिकेश स्थित पशुलोक सेवा समिति को कथित तौर पर पट्टे पर दिया गया था और समिति ने बदले में अपने सदस्यों को भूखंड आवंटित किए थे।

हालांकि, बाद में समिति और उसके सदस्यों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया, जिसका अंत पक्षों के बीच समझौते से हुआ, जिसे “अदालत ने मिलीभगत वाला फरमान” बताया था।

पीठ ने कहा कि बाद में समिति परिसमापन में चली गई और 23 अक्टूबर 1984 के एक समर्पण विलेख के माध्यम से उसने 594 एकड़ जमीन वन विभाग को वापस सौंप दी।

न्यायालय ने कहा कि भूमि को वापस सौंपे जाने और उस पर सरकार का स्वामित्व पुन: स्थापित होने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है।

हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि इसके बावजूद 2001 में कुछ निजी व्यक्तियों ने जमीन के कुछ हिस्सों पर कथित तौर पर कब्जा कर लिया।

उसने कहा कि एक निजी प्रतिवादी कथित तौर पर समिति और उसके सदस्यों के बीच मिलीभगत से हुए समझौते के आधार जमीन पर स्वामित्व का दावा कर रहा है।

पीठ ने कहा, “जो बात हमें चौंकाने वाली लगती है, वह यह है कि उत्तराखंड सरकार और उसके अधिकारी मूक दर्शक बने हुए हैं, जबकि उनकी आंखों के सामने व्यवस्थित रूप से वन भूमि पर कब्जा किया जा रहा है।”

भाषा पारुल दिलीप

दिलीप