चेन्नई, 16 मार्च (भाषा)कवि-गीतकार वैरामुथु को प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की तमिल बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने निंदा की है, जिसे अनुभवी गीतकार के खिलाफ बढ़ रहे सांस्कृतिक प्रतिरोध का संकेत माना जा रहा है।
इस मुहिम का नेतृत्व समकालीन भारतीय साहित्य की सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक जयमोहन कर रहे हैं। उन्होंने वैरामुथु को ‘हास्यास्पद फिल्मी गीतकार’ कहा है।
जयमोहन ने ज्ञानपीठ समिति को भेजे गए एक औपचारिक पत्र में वैरामुथु को सम्मानित करने पर गहरी नाराजगी जताई और गीतकार की साहित्यिक योग्यता को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए कहा कि किसी संस्कृति का अस्तित्व उसकी नैतिक स्पष्टता पर निर्भर करता है और फिल्मी गीतों में तकनीकी दक्षता गंभीर साहित्यिक परंपरा में योगदान के बराबर नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘‘ माननीय वैरामुथु न तो कवि हैं और न ही लेखक। वे महज एक हास्यास्पद तमिल फिल्मी गीतकार हैं। समकालीन तमिल साहित्य में उनकी कोई भूमिका नहीं है। मैं उनके प्रति अपना गहरा तिरस्कार व्यक्त करता हूं।’’
उत्तर आधुनिकतावादी लेखिका चारू निवेदिता ने भी वैरामुथु को सम्मानित किये जाने पर सवाल उठाया है। उन्होंने अपने विशिष्ट अंदाज में इस विवाद का तीखा आकलन प्रस्तुत किया।
उन्होंने विचार व्यक्त किया कि राजनीतिक और सांस्कृतिक अभिजात वर्ग द्वारा गीतकार को लगातार संरक्षण देना एक व्यापक बीमारी का लक्षण है जो नैतिक स्थिरता की तुलना में सत्ता के करीब रहने को प्राथमिकता देती है।
निवेदिता ने अपनी वेबसाइट पर लिखा, ‘‘हमारे समाज में एक अजीब तर्क है कि अगर किसी पुरुष पर 17 महिलाओं द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप भी लगाया जाता है, तो भी राजनीतिक प्रभाव होने पर उसे कवि या महान कवि की उपाधि दी जा सकती है। यह साहित्य का पुरस्कार नहीं है, यह तो दरिंदे की जीत का जश्न है।’’
पार्श्व गायिका चिनमयी श्रीपदा ने भी वैरामुथु को सम्मानित किये जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि विभिन्न आयु वर्ग की कई महिलाओं से छेड़छाड़ करने वाले व्यक्ति को राज्य और साहित्यिक निकायों द्वारा सम्मानित कैसे किया जा सकता है?
उन्होंने कमल हासन और पवन कल्याण सहित उद्योग जगत के दिग्गजों की चुप्पी और समर्थन की भी आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे व्यक्तियों को सम्मानित करने से पीड़ितों की आवाज दब जाती है और दण्ड मुक्ति की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।
भाषा धीरज नरेश
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