उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति की किताब का विमोचन किया

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उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति की किताब का विमोचन किया

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  • Publish Date - April 1, 2026 / 06:21 PM IST,
    Updated On - April 1, 2026 / 06:21 PM IST

(तस्वीरों के साथ)

नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने बुधवार को कहा कि भारत में लोकतांत्रिक परंपरायें निरंतर, समावेशी और समाज की गहराइयों में रची-बसी रही हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि ये परंपराएं एक व्यापक सभ्यतागत लोकाचार का अभिन्न हिस्सा हैं, जो संवाद, सहमति और विविध मतों के सम्मान को सर्वोपरि मानता है।

राधाकृष्णन ने राज्यसभा सदस्य सुधा मूर्ति की किताब ‘टाइड्स ऑफ टाइम : भारत्स हिस्ट्री थ्रू म्यूरल्स इन पार्लियामेंट’ का विमोचन करने के बाद संसद परिसर में अपने संबोधन में इस बात पर प्रकाश डाला कि उत्तर में वैशाली से लेकर दक्षिण में ‘कुडावोलाई’ प्रणाली तक, भारत में लोकतांत्रिक परंपराएं हमेशा से चली आ रही हैं, जो समाज में गहराई से समाई हुई हैं और सभी को शामिल करती हैं।

‘टाइड्स ऑफ टाइम : भारत्स हिस्ट्री थ्रू म्यूरल्स इन पार्लियामेंट’ का प्रकाशन लोकसभा सचिवालय ने किया है। इसके विमोचन कार्यक्रम में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी मौजूद थे।

राज्यसभा के सभापति राधाकृष्णन ने कहा कि ये परंपराएं एक व्यापक सभ्यतागत लोकाचार का हिस्सा हैं, जो संवाद, आम सहमति और विविध मतों का सम्मान करने पर जोर देता है। उन्होंने कहा कि यही बात भारत को ‘लोकतंत्र की जननी’ बनाती है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संविधान सदन (पुराना संसद भवन) में मौजूद भित्तिचित्र केवल कलाकृतियां ही नहीं हैं, बल्कि भारत की सभ्यतागत यात्रा को दर्शाने वाली दृश्य कथाएं हैं।

महान तमिल कवि सुब्रमण्य भारती को उद्धृत करते हुए राधाकृष्णन ने भारत के समृद्ध ज्ञान, गरिमा, परोपकार और सांस्कृतिक गहराई पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ऐसी नींव स्वाभाविक रूप से समावेशिता और सभी स्वरों के प्रति सम्मान को बढ़ावा देती है।

राधाकृष्णन ने संसद भवन में पारंपरिक प्रतीकों को शामिल किए जाने की सराहना भी की।

उन्होंने संसद के संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति के संबोधन के दौरान चोल राजवंश के पवित्र ‘सेंगोल’ के औपचारिक प्रदर्शन का भी जिक्र किया और इसे आधुनिक भारत को उसकी सभ्यतागत जड़ों से जोड़ने वाला एक शक्तिशाली प्रतीक बताया।

भाषा पारुल रंजन

रंजन