उत्तराखंड में जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिए झीलों में लगायी जाएगी चेतावनी प्रणाली

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उत्तराखंड में जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिए झीलों में लगायी जाएगी चेतावनी प्रणाली

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  • Publish Date - May 5, 2026 / 06:08 PM IST,
    Updated On - May 5, 2026 / 06:08 PM IST

देहरादून, पांच मई (भाषा) उत्तराखंड सरकार संवेदनशील हिमनदी (ग्लेशियल) झीलों में अत्याधुनिक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और निगरानी तंत्र स्थापित करेगी, जिससे इन झीलों से जोखिम प्रबंधन को वैज्ञानिक एवं तकनीकी रूप से सुदृढ़ किया जा सके। अधिकारियों ने यह जानकारी दी ।

प्रदेश के मुख्य सचिव आनंद बर्धन की अध्यक्षता में सोमवार को हुई एक समीक्षा बैठक में उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण एवं वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान द्वारा वर्तमान प्रगति एवं भविष्य की कार्ययोजना प्रस्तुत की गई ।

बैठक में प्रदेश के आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि वाडिया संस्थान द्वारा वसुंधरा झील को एक ‘पायलट साइट’ के रूप में विकसित किया जा रहा है जहां अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम एवं मॉनिटरिंग मैकेनिज्म स्थापित किया जाएगा ।

उन्होंने कहा कि इस मॉडल को भविष्य में अन्य संवेदनशील हिमनदी झीलों पर भी लागू किया जाएगा जिससे प्रदेश में हिमनदी झीलों से जोखिम प्रबंधन को वैज्ञानिक एवं तकनीकी रूप से सुदृढ़ किया जा सके ।

सुमन ने बताया कि भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली के तहत वर्तमान में प्रदेश में 169 सेंसर एवं 112 सायरन स्थापित किए जा चुके हैं । उन्होंने बताया कि फरवरी 2026 में आईआईटी रुड़की के साथ एक समझौता ज्ञापन पर दस्तखत किए गये हैं जिससे चालू वर्ष के दौरान इस प्रणाली का संचालन और रखरखाव किया जा रहा है ।

उन्होंने बताया कि मौजूदा चेतावनी प्रणाली को और सशक्त बनाने के लिए राज्य में भूकंपीय संवेदनशील क्षेत्रों में 500 स्ट्रॉन्ग मोशन सेंसर की तैनाती की जा रही है जबकि इनके अलावा 526 अतिरिक्त सेंसर की स्थापना भी प्रस्तावित है ।

सुमन ने बताया कि राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के तहत देशभर में संचालित कुल 167 भूकंपीय वेधशालाओं में से आठ उत्तराखंड में स्थित हैं जबकि रुड़की, देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रामनगर, बागेश्वर, अल्मोड़ा, केदारनाथ एवं चकराता में भी नई स्थायी वेधशालाएं स्थापित करने का प्रस्ताव है।

बैठक में मलबा बहाव से संबंधित जोखिम आकलन की भी समीक्षा की गयी और बताया गया कि चमोली, उत्तरकाशी एवं पिथौरागढ़ जनपदों में कुल 48 संवेदनशील स्थानों की पहचान की गई है।

अधिकारियों ने बैठक में जानकारी दी कि ये सभी स्थान मुख्यतः जल निकासी मार्गों (ड्रेनेज चैनल) के आसपास स्थित हैं, जिन्हें जोखिम के आधार पर उच्च, मध्यम एवं निम्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

अधिकारियों के अनुसार, जोखिम आकलन के लिए विभिन्न संस्थानों—उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान तथा उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र जैसे संस्थानों के विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक संयुक्त टीम का गठन किया गया है ।

मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि चिन्हित संवेदनशील स्थलों पर प्राथमिकता के आधार पर सर्वेक्षण, निगरानी एवं अन्य आवश्यक कार्य करने तथा प्रशासन एवं तकनीकी संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

भाषा दीप्ति रंजन

रंजन