भोजशाला विवाद : मुस्लिम पक्ष ने एएसआई रिपोर्ट को ‘पक्षपातपूर्ण’ और ‘साक्ष्यहीन’ बताया

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भोजशाला विवाद : मुस्लिम पक्ष ने एएसआई रिपोर्ट को ‘पक्षपातपूर्ण’ और ‘साक्ष्यहीन’ बताया

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  • Publish Date - May 11, 2026 / 09:07 PM IST,
    Updated On - May 11, 2026 / 09:07 PM IST

इंदौर, 11 मई (भाषा) मुस्लिम पक्ष ने विवादित भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में सोमवार को दावा किया कि यह दस्तावेज “पक्षपातपूर्ण” है और इसे हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं के दावों का समर्थन करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

धार की भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है।

धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की आपत्तियों में कहा गया है कि एएसआई ने अपनी पूरी सर्वेक्षण रिपोर्ट में ‘‘भोजशाला मंदिर’’ शब्द का इस्तेमाल किया, जबकि ऐसा कोई ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे साबित हो सके कि विवादित परिसर किसी भी समय ‘‘भोजशाला मंदिर’’ था।

आपत्तियों में कहा गया है कि इस तरह की शब्दावली एएसआई के ‘‘पूर्वाग्रह और पक्षपात’’ को दर्शाती है।

मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि एएसआई ने ऐतिहासिक ग्रंथों और अपने पुराने अभिलेखों की अनदेखी की और उसकी सर्वेक्षण रिपोर्ट के निष्कर्षों का कोई कानूनी आधार नहीं है।

मुस्लिम पक्ष ने कहा कि एएसआई ने उसे सर्वेक्षण की पूरी वीडियोग्राफी और रंगीन तस्वीरें उपलब्ध नहीं कराईं। आपत्तियों में दावा किया गया कि उपलब्ध कराए गए कई वीडियो क्लिप 45 सेकंड से अधिक लंबे नहीं हैं।

मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और अधिवक्ता तौसीफ वारसी ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के सामने आपत्तियां पेश कीं।

मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने कहा कि एएसआई की सर्वेक्षण रिपोर्ट यह साबित करने में विफल रही कि कमाल मौला मस्जिद किसी अन्य धार्मिक संरचना को ध्वस्त करके बनाई गई थी।

याचिकाकर्ताओं में शामिल संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने दावा किया है कि भोजशाला मूलत: परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा वर्ष 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर है, जिसे मालवा क्षेत्र पर अलाउद्दीन खिलजी की फौज के आक्रमण के दौरान 1305 में ढहाया गया था।

मुस्लिम पक्ष ने इसका खंडन करते हुए कहा कि एएसआई की रिपोर्ट में भोजशाला जैसे किसी स्मारक या परमार वंश के किसी राजा द्वारा निर्मित किसी संरचना का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।

मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से पैरवी करते हुए खुर्शीद ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया था कि ऐसी कोई “खुदाई’’ नहीं की जाए, जिससे विवादित स्मारक का स्वरूप बदल सकता हो, लेकिन इसका उल्लंघन करते हुए एएसआई दल ने मस्जिद परिसर में खुदाई की।

उन्होंने कहा कि एएसआई ने विवादित परिसर में एक ही स्लैब के नीचे से कई कलाकृतियां बरामद होने का दावा किया है, लेकिन वीडियो क्लिप में वहां कागज, प्लास्टिक की बोतलें और कप जैसी चीजें भी दिखाई दे रही हैं।

मुस्लिम पक्ष के वकील ने इसे ‘महज दिखावा’ बताया।

खुर्शीद ने कहा, ‘‘प्लास्टिक का आविष्कार 13वीं या 14वीं सदी में नहीं हुआ था।”

वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि बरामद कलाकृतियां साफ हालत में दिख रही हैं और उन पर मिट्टी नहीं जमी है। उन्होंने दलील दी कि अगर ये वस्तुएं सदियों से जमीन में दबी होतीं, तो उन पर मिट्टी जरूर होती।

खुर्शीद ने कहा कि उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में ‘कार्बन डेटिंग’ (पुरातात्विक वस्तुओं या अवशेषों की आयु निर्धारित करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया) का निर्देश दिया था, लेकिन एएसआई ने यह प्रक्रिया संपन्न नहीं कराई।

उन्होंने दावा किया कि विवादित परिसर में एएसआई के सर्वेक्षण के दौरान गौतम बुद्ध की प्रतिमा भी मिली थी, लेकिन रिपोर्ट में उसका जिक्र नहीं किया गया है।

मामले में सुनवाई मंगलवार को भी जारी रहेगी।

उच्च न्यायालय भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।

उच्च न्यायालय ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। एएसआई ने 22 मार्च 2024 से इस परिसर का सर्वेक्षण शुरू किया था। एएसआई ने 98 दिन के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट पेश की थी।

एएसआई की 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि भोजशाला परिसर में धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद के मुकाबले पहले से मौजूद थी और वहां वर्तमान में मौजूद एक विवादित ढांचा मंदिर के हिस्सों का फिर से इस्तेमाल करते हुए बनाया गया था।

भाषा

हर्ष पारुल

पारुल