भारत की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा धर्मों के बीच भेदभाव नहीं करने की ऐतिहासिक परंपरा में निहित: भागवत

भारत की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा धर्मों के बीच भेदभाव नहीं करने की ऐतिहासिक परंपरा में निहित: भागवत

भारत की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा धर्मों के बीच भेदभाव नहीं करने की ऐतिहासिक परंपरा में निहित: भागवत
Modified Date: September 18, 2026 / 10:41 pm IST
Published Date: September 18, 2026 10:41 pm IST

उज्जैन (मध्यप्रदेश), 18 सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि भारत की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा धर्मों के बीच भेदभाव नहीं करने की उसकी ऐतिहासिक परंपरा में निहित है। इसके साथ ही उन्होंने आगाह किया कि मानव अहंकार और दंभ इस गलत धारणा को जन्म देते हैं कि कोई भी प्राकृतिक व्यवस्था को नियंत्रित कर सकता है।

उज्जैन में ‘युवा धर्म संसद’ में करीब 1,700 ‘जेन-जी’ प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि ‘धर्म’ के बारे में भारत की समझ पश्चिमी देशों की धर्म की धारणा से मौलिक रूप से भिन्न है, जो शासकों और धार्मिक सत्ताओं के बीच ऐतिहासिक संघर्षों से उपजी थी।

उन्होंने कहा, ‘हमारा देश हमेशा आपस में घुलमिल कर रहा है। यह अपने लोगों के बीच भेदभाव नहीं करता है। यह हमारे लिए पंथ निरपेक्षता का यही अर्थ है।’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि जहां पंथ (रिलिजन) बांधता है, वहीं ‘धर्म’ मुक्त करता है और ‘मोक्ष’ की ओर ले जाता है।

मानवीय दंभ के प्रति चेतावनी देते हुए भागवत ने कहा कि एक व्यक्ति का अहंकार अक्सर पूर्ण नियंत्रण का एक मिथ्या भ्रम पैदा करता है।

भागवत ने कहा, ‘उदाहरण के लिए, सूर्य को लें। उसका उदय और अस्त होना निश्चित है। मनुष्य अपने अहंकार में रहता है कि सब कुछ उसके अपने अधिकार से चलता है। और उसके कारण, वह यह गलत धारणा रखता है कि ऐसी चीजें भी उसकी इच्छा के अनुसार चलनी चाहिए और करनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है। आप इसके बारे में कुछ नहीं कर सकते।’

इस बयान पर तंज करते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘क्या वह किसी कथित ‘नॉन बायलॉजिकल’ की बात कर रहे हैं, जिनका अवतरण दिवस अभी मनाया गया था?’

दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट परीक्षा के पेपर लीक को लेकर छात्रों के बड़े पैमाने पर प्रदर्शन के बाद से आरएसएस ने ‘जेन-जी’ तक अपनी पहुंच बढ़ाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। इन प्रदर्शनों ने युवाओं के असंतोष को सतह पर ला दिया था, जिसके चलते तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था।

भागवत ने जीवन और व्यवसाय के प्रति ‘धार्मिक’ दृष्टिकोण का विवरण देते हुए युवाओं से पूर्वाग्रहों को दूर करने और पर्यावरणीय जिम्मेदारी अपनाने का भी आग्रह किया और साथ ही चेतावनी दी कि वनों का विनाश ‘अधर्म’ के बराबर है।

भागवत ने कहा कि वह ऐसे समय में युवाओं को ‘धर्म’ पर चर्चा करते हुए देखकर खुश हैं जब कुछ लोग इसे पुराने लोगों का मामला मानते हैं।

भागवत ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा शासकों और धार्मिक सत्ताओं के बीच संघर्ष से उभरी है और इसलिए यह भारतीय संदर्भ में उसी तरह ‘फिट’ नहीं बैठती है।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत पारंपरिक रूप से जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पहलुओं को अलग करने के बजाय उन्हें एक साथ देखता है।

धर्म और ‘रिलिजन’ के बीच अंतर करते हुए भागवत ने कहा कि दोनों को समानार्थी नहीं माना जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अंग्रेजी भाषा में भारतीय अवधारणा के लिए कोई सटीक समकक्ष शब्द नहीं था, और ऐतिहासिक रूप से ‘रिलिजन’ शब्द का उपयोग पश्चिमी लोगों को समझाने के लिए किया गया था।

भागवत ने कहा कि जब ‘रिलिजन’ को धर्म से अलग कर दिया जाता है, तो वह संकीर्ण हो सकता है। उन्होंने धर्म को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन पर आधारित बताया।

उन्होंने ‘धर्म’ को एक ऐसे सिद्धांत के रूप में परिभाषित किया जो ब्रह्मांड को धारण करता है, सभी की प्रगति को बढ़ावा देता है और प्रत्येक जीव तथा वस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए कर्तव्य का निर्धारण करता है।

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि धर्म मानव आचरण में परिलक्षित होता है और युवा प्रतिभागियों से आग्रह किया कि अगर वे इसे समझना चाहते हैं तो पूर्वाग्रहों को त्याग दें।

उन्होंने धर्म को पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जोड़ते हुए कहा कि प्रकृति की रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है। भागवत ने कहा कि वनों का विनाश और पर्यावरण का क्षरण अधर्म के समान है।

उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे अपनी परंपराओं के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए पूजा के अन्य रूपों का सम्मान करें।

भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा लोगों को विभाजित करने के बजाय उन्हें एकजुट करने का प्रयास करती है। उन्होंने यह भी कहा कि देश ने ऐतिहासिक रूप से उन लोगों की भी मदद करने की कोशिश की है जो उससे असहमत थे या जिन्होंने मुश्किलें उत्पन्न की।

न्यूयॉर्क, टोरंटो और लंदन की अपनी हालिया यात्राओं का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि वहां के लोगों और भारतीय उद्यमियों ने व्यापार और धन सृजन पर ‘धार्मिक दृष्टिकोण’ अपनाना चाहा है।

भागवत ने कहा कि वे चिंतित हैं कि उनके व्यवसाय न केवल खुशी बल्कि दुख भी पैदा कर रहे हैं।

उन्होंने पारिवारिक जीवन की कीमत पर अत्यधिक धन की खोज पर सवाल उठाया और लोगों के उदाहरण का हवाला देते हुए सुबह 5 बजे घर छोड़ने और देर रात वापस आने का जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि विकास में इस तरह का असंतुलन अस्वास्थ्यकर है, इसकी तुलना शरीर के केवल एक हिस्से की वृद्धि से की जाती है जबकि बाकी अपरिवर्तित रहते हैं।

व्यवसाय के लिए ‘धार्मिक’ दृष्टिकोण के बारे में बताते हुए, भागवत ने कहा कि इसमें समाज को वापस देना शामिल है।

उन्होंने व्यापारिक समुदायों की ‘धर्मशालाओं’ और धर्मार्थ अस्पतालों के निर्माण की परंपरा का हवाला दिया, जहां लोगों को बिना शुल्क लिए सेवाएं प्रदान की जाती थीं, उनकी तुलना आज की कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) पहल से की जाती है।

भाषा ब्रजेन्द्र शोभना पवनेश

पवनेश


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