भोजशाला पर अब जैन समुदाय ने किया दावा, विवादित स्मारक में पूजा का अधिकार मांगा
भोजशाला पर अब जैन समुदाय ने किया दावा, विवादित स्मारक में पूजा का अधिकार मांगा
इंदौर, छह मई (भाषा) जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा करते हुए मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय से बुधवार को गुहार की कि समुदाय को इस स्मारक में उपासना का अधिकार प्रदान किया जाए।
दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सलेक चंद जैन ने यह जनहित याचिका ऐसे वक्त दायर की, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षित स्मारक के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों के दायर मुकदमे उच्च न्यायालय में पहले ही विचाराधीन हैं।
हिंदू पक्ष एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के आधार पर दावा कर रहा है कि यह स्मारक मूलत: एक मंदिर है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद करार दे रहा है।
जैन के वकील दिनेश पी. राजभर ने इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता के सामने एएसआई के 2003 के एक आदेश को चुनौती दी। इस आदेश के तहत विवादित स्मारक में हर मंगलवार को हिंदुओं और हर शुक्रवार को मुस्लिमों को उपासना की अनुमति दी गई है।
राजभर ने दावा किया कि भोजशाला परिसर में कभी जैन मंदिर और गुरुकुल हुआ करता था।
उन्होंने भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर जोर देते हुए कहा,‘‘देश के संविधान के तहत जैन धर्म के अनुयायियों को भोजशाला परिसर में पूजा का अधिकार है।’’
राजभर ने तर्क दिया कि धार के राजा भोज हिंदू और जैन, दोनों धर्मों के विद्वानों के संरक्षक थे।
उनके अनुसार भोजशाला में संचालित शिक्षण केंद्र में जैन विद्वान भी मौजूद थे।
राजभर ने ऐतिहासिक लेखों और पुरातात्विक सामग्री के हवाले से दावा किया कि भोजशाला की संरचना के कुछ हिस्सों में जैन वास्तुकला का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
उन्होंने शिमला की ‘गवर्नमेंट सेंट्रल प्रेस’ द्वारा 1882 में प्रकाशित रिपोर्ट और अन्य प्रकाशनों का जिक्र भी किया जिसमें विवादित परिसर की मस्जिद के कुछ हिस्सों को जैन समुदाय से जुड़ी इमारतों के अवशेषों से निर्मित बताया गया था और इसके कुछ गुंबदों तथा खंभों की तुलना माउंट आबू स्थित प्रसिद्ध देलवाड़ा जैन मंदिरों से की गई थी।
राजभर ने कुछ चित्रों और संग्रहालय के विवरणों का हवाला देते हुए कहा कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा बता रहा है, वह असल में जैन यक्षिणी अम्बिका की मूर्ति है।
उन्होंने तर्क दिया कि इस मूर्ति में जैन तीर्थंकरों के प्रतीक चिन्ह हैं और यह विशिष्ट खूबी इसे देवी सरस्वती की हिंदू शैली की प्रतिमाओं से अलग करती है।
राजभर ने यह भी कहा कि एएसआई ने भोजशाला के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में इस स्मारक से जैन समुदाय के ऐतिहासिक संबंधों को नजरअंदाज कर दिया।
उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि सरकार विवादित स्मारक को लेकर एक वर्ग के दावों का सीधे तौर पर समर्थन कर रही है और उसका यह रवैया संदेह उत्पन्न करता है।
भोजशाला मामले में बृहस्पतिवार को भी सुनवाई जारी रहेगी।
उच्च न्यायालय भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।
भाषा हर्ष जितेंद्र
जितेंद्र

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