भोपाल, 12 सितंबर (भाषा) मध्यप्रदेश के एक डॉक्टर दंपति द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में सिकल सेल रोग की जांच और आनुवंशिक परामर्श के लिए विकसित किफायती प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है और इसका उल्लेख हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक में किया गया है।
होम्योपैथ चिकित्सक प्रोफेसर डॉ. निशांत नम्बीसन और उनकी पत्नी डॉ. स्मिता नम्बीसन की इस पहल का उल्लेख आणविक आनुवंशिकीविद् केविन डेविस की अगस्त में प्रकाशित पुस्तक ‘कर्व्ड एयर: ए बायोग्राफी ऑफ सिकल सेल एनीमिया एंड द क्वेस्ट टू क्योर द फर्स्ट मॉलिक्यूलर डिजीज’ में किया गया है।
निशांत नम्बीसन ने शनिवार को ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की इस पुस्तक में हमारे काम को जगह मिलना मध्यप्रदेश से शुरू हुई जमीनी स्तर की स्वास्थ्य पहल की अंतरराष्ट्रीय पहचान है।’’
निशांत भोपाल स्थित शासकीय होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, जबकि उनकी पत्नी स्मिता चिकित्सक और स्वतंत्र शोधकर्ता हैं।
पुस्तक में सिकल सेल रोग से जुड़े वैज्ञानिक अनुसंधान, इसकी रोकथाम और उपचार की वैश्विक यात्रा का उल्लेख करते हुए मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में नम्बीसन दंपति के काम को भी रेखांकित किया गया है।
निशांत ने बताया कि इस पहल की शुरुआत छिंदवाड़ा में सिकल सेल रोग से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों की समस्याएं देखने के बाद हुई। उन्होंने बताया कि जागरूकता की कमी, जांच की सीमित सुविधा और आनुवंशिक परामर्श तक पहुंच न होना बड़ी चुनौतियां थीं।
उन्होंने कहा कि 2018 में उनकी टीम ने स्थानीय प्रशासन के सहयोग से घर-घर जाकर करीब 25,000 लोगों की जांच की। इस दौरान जांच को लेकर डर, स्वास्थ्य केंद्रों से दूरी, सामाजिक झिझक और आनुवंशिक परामर्श की सीमित उपलब्धता जैसी व्यावहारिक समस्याएं सामने आईं।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए उन्होंने और उनकी टीम ने जीआईपीसीआई (जेनेटिक इनहेरिटेंस प्रेडिक्शन काउंसलिंग आइडेंटिफिकेशन) कार्ड विकसित किया। इसमें रंगों और विशेष पंच-होल प्रणाली के जरिए लोगों को सिकल सेल की स्थिति तथा बच्चों में आनुवंशिक रूप से बीमारी पहुंचने के जोखिम को समझने में मदद की जाती है।
पुस्तक में इस प्रणाली को मोबाइल ऐप और केंद्रीय डेटाबेस से जोड़ने के प्रस्ताव का भी उल्लेख है, जिससे आनुवंशिक परामर्श को सरल और अधिक सुलभ बनाया जा सके।
भारत के 2047 तक सिकल सेल रोग को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में खत्म करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर डेविस के सवाल के जवाब में प्रोफेसर नम्बीसन को पुस्तक में उद्धृत किया गया है, ‘‘महत्वाकांक्षी होने में कोई बुराई नहीं है। यह लक्ष्य हासिल होगा या नहीं, यह समय बताएगा।’’
भाषा दिमो
नेत्रपाल सुरभि
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