इंदौर, 23 अप्रैल (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में मुस्लिम पक्ष के एक याचिकाकर्ता ने बृहस्पतिवार को दावा किया कि धार शहर में किसी विशिष्ट मंदिर को किसी खास दौर में ढहाकर उस स्थान पर मस्जिद बनाए जाने का कोई भी सबूत नहीं है।
इस याचिकाकर्ता ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद के मुकदमे में हिंदू पक्ष के दावे को खारिज करते हुए यह बात कही।
हिंदू पक्ष के मुताबिक धार के परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा भोजशाला परिसर में वर्ष 1034 में बनवाया गया सरस्वती मंदिर मध्यकालीन भारत के शासक अलाउद्दीन खिलजी के हुक्म पर 1305 में ढहाया गया था और इसके अवशेषों का वहां मस्जिद के निर्माण में फिर से इस्तेमाल किया गया था।
भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ भोजशाला के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रही है।
मुस्लिम पक्षकारों में शामिल धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी के सामने विस्तृत दलीलें पेश कीं।
उन्होंने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई भी सबूत नहीं है कि धार में किसी ‘विशिष्ट मंदिर’ को किसी ‘विशिष्ट दौर’ में ढहाया गया था और इसके बाद उस स्थान पर कोई मस्जिद बनाई गई थी।
खुर्शीद ने 2003 में ब्रिटिश उच्चायोग की ओर से मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को भेजे कथित पत्र का हवाला दिया और यह दावा भी किया कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ता भोजशाला की वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा बता रहे हैं, वह असल में जैन समुदाय की देवी अम्बिका की मूर्ति है।
उन्होंने अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मुकदमे में उच्चतम न्यायालय के सुनाए ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया और कहा कि धार के विवादित परिसर का मालिकाना हक कानून के उन स्थापित सिद्धांतों और सबूतों के मानकों के बूते तय किया जाना चाहिए जो किसी दीवानी मामले की कार्यवाही को नियंत्रित करते हैं।
खुर्शीद ने इस बात पर बल दिया कि धार के विवादित परिसर का मालिकाना हक तय करने के लिए उच्च न्यायालय के सामने पेश सभी दस्तावेजों, ग्रंथों और अन्य सामग्री की प्रामाणिकता की अच्छी तरह छानबीन की जानी चाहिए।
उन्होंने रामसेवक गर्ग की हिन्दी पुस्तक ‘हजरत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह और उनका युग’ का हवाला देते हुए कहा कि मालवा के परमार शासकों की राजधानी रहा धार शहर रियासतकाल के दौरान कई हमलों, लूट-पाट, विध्वंस और पुनर्निर्माण का गवाह रहा है जिनमें भारत के हिंदू राजा भी शामिल थे।
मुस्लिम पक्ष के वकील ने इस पुस्तक का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी के सामने 1305 में मालवा पर आक्रमण के दौरान धार को लूटने और जीतने की आवश्यकता ही नहीं बची थी और उसे मांडू (मालवा का एक अन्य ऐतिहासिक शहर) पर फतह हासिल करने के बाद धार में केवल शासन व्यवस्था स्थापित करनी पड़ी।
इतिहासकारों के अनुसार ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी, अलाउद्दीन खिलजी का अनुभवी सेनापति और प्रशासनिक अधिकारी था जिसने मालवा में खिलजी की सत्ता की जड़ें मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
खुर्शीद ने उच्च न्यायालय में अपनी दलीलों में यह भी कहा कि धार के विवादित परिसर में अजमेर के चिश्तिया सिलसिले के सूफी संत मौलाना कमालुद्दीन से जुड़ी मस्जिद ‘तत्कालीन शासक’ ने बनवाई थी।
उन्होंने हिंदू पक्ष के इस दावे को खारिज किया कि मस्जिद की तामीर तलवार के दम पर की गई थी।
भाषा
हर्ष रवि कांत