सामाजिक समरसता के खिलाफ ये कैसी सनक? 

सामाजिक समरसता के खिलाफ ये कैसी सनक? 
Modified Date: January 20, 2026 / 11:23 am IST
Published Date: January 20, 2026 11:23 am IST

सामाजिक समरसता के खिलाफ ये कैसी सनक? 

– ललित व्यास पांडेय

 ⁠

समकालीन सामाजिक विमर्श में कुछ ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी उभरे हैं जो स्वयं को वंचितों का एकमात्र प्रतिनिधि और समाज का नैतिक पथप्रदर्शक घोषित करते हैं। किंतु जब उनके वक्तव्यों, सत्रों और सार्वजनिक संवादों का गहन विश्लेषण किया जाता है, तो यह प्रश्न अनिवार्य हो उठता है -क्या यह वास्तव में सामाजिक न्याय का प्रयास है, या फिर समाज को स्थायी रूप से विभाजित करने की एक वैचारिक रणनीति?

हाल ही में एक प्रसंग विशेष रूप से ध्यान खींचता है, जब एक स्वयंभू विचारक ने तकनीक तक को जातिगत चश्मे से देखने का प्रयास किया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे तटस्थ औज़ार AI, Chatgpt को भी “सवर्ण” करार दे दिया। यह घटना मात्र अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उस ज्ञानांधता का संकेत है जहाँ वैचारिक कुंठा इस हद तक हावी हो चुकी है कि हर वस्तु, हर विचार और हर व्यवस्था में केवल जाति का एंगल ही खोजा जाता है। जब तकनीक जो न जाति जानती है, न धर्म ! को भी सामाजिक विभाजन का औज़ार बना दिया जाए, तब समस्या विचारधारा की नहीं, मानसिक विकृति की बन जाती है। समस्या सामाजिक समानता के विचार में नहीं है। पिछड़े, वंचित और हाशिये पर रहे वर्गों के उत्थान के लिए प्रयास करना किसी भी सभ्य समाज का दायित्व है। किंतु जब यह प्रयास किसी अन्य वर्ग के प्रति पूर्वनियोजित द्वेष पर आधारित हो जाए, तब वह न्याय नहीं रह जाता वह प्रतिशोध का वैचारिक रूप बन जाता है।

इसी क्रम में हाल के दिनों में एक और गंभीर व चिंताजनक घटना सार्वजनिक विमर्श का विषय बनी। सामाजिक समरसता के नाम पर एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा सार्वजनिक मंच से ऐसा वक्तव्य दिया गया, जिसे व्यापक स्तर पर असंतुलित, असंवेदनशील और सामाजिक रूप से विभाजनकारी माना गया।

उक्त अधिकारी ने अपने वक्तव्य में यह कहा कि “जब सामान्य वर्ग की बहू-बेटियों के साथ संबंध बनने लगेंगे, तभी सामाजिक समरसता आएगी।” इस कथन को समाज के एक बड़े वर्ग ने न केवल आपत्तिजनक माना, बल्कि इसे एक विशेष वर्ग की गरिमा, सम्मान और अस्मिता पर सीधा आघात भी समझा।

किसी भी संवैधानिक या उच्च प्रशासनिक पद पर आसीन व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि उसके वक्तव्य संविधान की भावना, सामाजिक मर्यादा और समावेशी मूल्यों के अनुरूप हों। ऐसे पदों पर बैठे व्यक्तियों के शब्द समाज को जोड़ने, संवाद को प्रोत्साहित करने और सौहार्द को सुदृढ़ करने वाले होने चाहिए, न कि ऐसे, जो किसी वर्ग को अपमानित करें या सामाजिक विभाजन को गहरा करें।स्थिति तब और अधिक गंभीर हो गई, जब इस बयान को वर्षों से एक विशेष समाज के साथ हुए कथित अन्याय की “दबी-कुचली पीड़ा” के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह तर्क दिया गया कि उक्त वक्तव्य भेदभाव और उत्पीड़न से उपजे आक्रोश की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है, और इसलिए इसे गलत नहीं ठहराया जाना चाहिए।

इतना ही नहीं, इस सोच के समर्थन में समाज के कुछ धड़े सड़कों पर उतर आए और सार्वजनिक रूप से उक्त बयान का बचाव करने का प्रयास किया गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि समस्या केवल एक व्यक्ति के बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक गहरी सामाजिक वैचारिक दरार की ओर संकेत करती है। इस पूरे प्रकरण ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या सामाजिक न्याय और समरसता की स्थापना के लिए अपमानजनक, विभाजनकारी और संवेदनहीन वक्तव्यों को स्वीकार्य ठहराया जा सकता है। स्पष्ट है कि किसी भी प्रकार की सामाजिक पीड़ा या ऐतिहासिक अन्याय का समाधान ऐसे बयानों से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, संवाद, आपसी सम्मान और विधिक-सामाजिक सुधारों के माध्यम से ही संभव है। समरसता का अर्थ संवाद और सम्मान है, न कि उत्तेजक प्रतीकों और अपमानजनक संकेतों के माध्यम से सामाजिक तनाव को बढ़ावा देना।

इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि हाल के दिनों में एक वर्ग विशेष के छात्रों को भ्रमित और बरगलाकर जन आक्रोश रैली जैसे उकसाने वाले स्लोगन से पूरे प्रदेश के मासूम विद्यार्थियों को एकत्र करने का प्रयास किया गया। “संविधान बचाओ” जैसे गंभीर और पवित्र उद्देश्य के नाम पर राजधानी में रैली और सभा का आयोजन किया गया, किंतु व्यवहार में यह आयोजन सामाजिक चेतना से अधिक राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति का मंच बनकर रह गया।

इस रैली और सभा में कई बड़े पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा छात्रों को संबोधित करते हुए भड़काऊ और उत्तेजक भाषण दिए गए। संविधान, समानता और अधिकारों की बात करने के बजाय भाषणों का स्वर एक वर्ग विशेष के प्रति घृणा, आक्रोश और विभाजन को बढ़ावा देने वाला दिखाई दिया। यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो गई, जब जनसमूह की भीड़ देखकर एक पूर्व विधायक स्वयं को संयमित नहीं रख सके और सार्वजनिक मंच से ऐसे आपत्तिजनक वक्तव्य दे डाले, जो किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में अस्वीकार्य हैं।

उक्त नेता ने संतों, महंतों और कथा-वाचकों जैसे समाज के प्रतिष्ठित और सम्मानित वर्गों के विरुद्ध अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए उन्हें “जूतों की माला पहनाकर नंगा घुमाने” जैसी घृणित और हिंसक मानसिकता को दर्शाने वाली बात कही। इतना ही नहीं, उन्होंने महिलाओं के सम्मान को भी आघात पहुँचाने वाले शब्दों का प्रयोग करते हुए बहन-बेटियों को “प्लॉट की तरह सौ बार रजिस्ट्री कराने” जैसी आपत्तिजनक टिप्पणी की। इस प्रकार के बयान न केवल संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हैं, बल्कि वे सामाजिक नैतिकता और मानवीय गरिमा पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं।

यह विडंबना ही है कि जो लोग स्वयं घृणा, अपमान और उकसावे की भाषा को खुले मंच से वैध ठहराते हैं, वही स्वयं को सामाजिक उत्थान और समानता का ठेकेदार घोषित करते हैं। प्रश्न यह है कि ऐसी घृणित और असंतुलित मानसिकता से प्रेरित लोग यदि समाज का मार्गदर्शन करेंगे, तो वास्तव में किस वर्ग का कल्याण होगा और किस प्रकार की समानता स्थापित की आज एक प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है जिसमें हर विषय, हर समस्या और हर ऐतिहासिक संदर्भ को केवल जातिगत दृष्टिकोण से देखा जाता है। इतिहास में हुए शोषण की चर्चा आवश्यक है, परंतु उसे इस प्रकार प्रस्तुत करना कि वर्तमान पीढ़ी स्थायी पीड़ित-बोध में जीने लगे, न तो रचनात्मक है और न ही समाधानकारी। यह युवाओं को संवाद के लिए नहीं, बल्कि टकराव के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है।

सामाजिक समरसता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि किसी एक वर्ग के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई किसी दूसरे वर्ग को वंचित बनाकर की जाए। अन्याय के बदले अन्याय, यह तर्क न नैतिक है, न संवैधानिक और न ही सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य। समाज को सबसे अधिक क्षति उन लोगों से पहुँची है जो अधूरे ज्ञान और कुतर्कों के सहारे स्वयं को विचारक सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। अनपढ़ समाज को उतना नुकसान नहीं पहुँचा सकता है, किंतु कुपढ़ समाज को दिशा से भटका देता है। जब शिक्षा संस्कारविहीन हो जाती है, तब वह सृजन नहीं, विभाजन का माध्यम बन जाती है। जिस प्रकार किसी इमारत की मजबूती उसकी नींव पर निर्भर करती है, उसी प्रकार ज्ञान की सार्थकता उसके मूल्यों और संस्कारों पर टिकी होती है। उथला ज्ञान, जब अहंकार, कुंठा और द्वेष से जुड़ जाता है, तो वह समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने लगता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक न्याय के नाम पर चल रहे विमर्शों की ईमानदार और निर्भीक समीक्षा की जाए। वंचितों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए, किंतु उन्हें किसी वैचारिक युद्ध का उपकरण नहीं बनाया जाना चाहिए। समाज को आगे बढ़ाने का मार्ग नफ़रत से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संतुलन और जिम्मेदार सार्वजनिक आचरण से होकर जाता है।जो लोग समाज-सुधार के नाम पर स्थायी वैमनस्यता बो रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि इतिहास केवल नारे नहीं, परिणाम भी दर्ज करता है। और परिणाम वही टिकाऊ होते हैं जो समाज को जोड़ते हैं, बाँटते नहीं।

– ललित व्यास पांडेय

Disclaimer- ब्लॉग में व्यक्त विचारों से IBC24 अथवा SBMMPL का कोई संबंध नहीं है। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर से जिम्मेदार हैं।


लेखक के बारे में