शह मात The Big Debate: बजट बंटा ‘मुफ्त’..योजनाएं पड़ीं सुस्त! विकास के लिए आखिर कहां से आएगा पैसा?

MP News: बजट बंटा 'मुफ्त'..योजनाएं पड़ीं सुस्त! विकास के लिए आखिर कहां से आएगा पैसा?

शह मात The Big Debate: बजट बंटा ‘मुफ्त’..योजनाएं पड़ीं सुस्त! विकास के लिए आखिर कहां से आएगा पैसा?

MP News| Photo Credit: Mohan Yadav X

Modified Date: January 10, 2026 / 11:43 pm IST
Published Date: January 10, 2026 11:39 pm IST
HIGHLIGHTS
  • एमपी सरकार का कुल कर्ज 53,100 करोड़ रुपए तक पहुंचा
  • लाड़ली बहना योजना पर सबसे ज्यादा खर्च – 22,000 करोड़ रुपए
  • राज्य पर कुल कर्ज 4.78 लाख करोड़ रुपए, जबकि बजट 4.21 लाख करोड़ रुपए

भोपाल: MP News मध्य प्रदेश सरकार जनकल्याण और सशक्तिकरण को लेकर ऐसी कई योजनाएं चला रही है, जिसके जरिए लाभार्थियों को डायरेक्ट पैसे भेजने पड़ रहे हैं, लेकिन अब ये योजनाएं सूबे की आर्थिक सेहत के लिए सिरदर्द बनती जा रही हैं। सरकार को हजारों करोड़ रुपए का कर्ज लेना पड़ रहा है। सरकार ने साल 2025 खत्म होने के पहले 3500 करोड़ रुपए का नया कर्ज लिया था। इसके बाद चालू वित्त वर्ष में एमपी सरकार का कुल कर्ज 53,100 करोड़ तक पहुंच गया है।

MP News अब आप इन योजनाओं के खर्चे भी जान लीजिए। लाड़ली बहना योजना पर जहां 22 हजार करोड़ रु खर्च हो रहे हैं, तो वहीं फ्री राशन योजना पर 2,800 करोड़ रु, फ्री बिजली योजना पर 5,500 करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं। जबकि उज्ज्वला योजना पर 600 करोड़ रु मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना 6 हजार करोड़ रुपए, वहीं सरकार की 3 फ्लैगशिप योजनाओं पर 28 हजार करोड़ का खर्चा खर्च आ रहा है और स्याह हकीकत ये भी है कि- मध्यप्रदेश पर अभी 4 लाख 78 हजार करोड़ का कर्ज है। जबकि 4.21 लाख करोड़ मप्र का कुल बजट है। वहीं सरकार 30 हजार करोड़ रुपए सालाना कुल कर्ज का ब्याज चुका रही है।

जहां प्रदेश पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है तो दूसरी ओर सूबे की सियासत भी गरमा गई है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि-भ्रष्टाचार में लिप्त राज्य सरकार केवल कर्ज लेकर घी पी रही है, तो कांग्रेस के आरोपों का पलटवार करते हुए बीजेपी ने दावा किया कि- कर्ज लेना कोई नई बात नहीं है। अंतिम पंक्ति के लोगों का विकास सरकार की प्राथमिकता है।

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कुलमिलाकर एमपी में बढ़ते कर्ज और फ्रीबीज को लेकर सियासी वार-पलटवार जारी है, लेकिन सवाल ये है कि- क्या ये फ्रीबीज योजनाएं प्रदेश के विकास की रफ्तार पर ब्रेक नहीं लगा रही हैं? सवाल ये कि- क्या अब चुनावी वादों को पूरा करना सरकार की मजबूरी बन चुकी है? सबसे बड़ा सवाल ये कि- क्या इसके लिए अकेले सरकार ही जिम्मेदार है, याकि फ्रीबीज के आधार पर जनमत सुनाने वाली जनता भी बराबर की भागीदार है?

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