बीएमसी चुनावों के रुझानों से कांग्रेस के हाशिये पर जाने के संकेत

बीएमसी चुनावों के रुझानों से कांग्रेस के हाशिये पर जाने के संकेत

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  • Publish Date - January 16, 2026 / 07:10 PM IST,
    Updated On - January 16, 2026 / 07:10 PM IST

मुंबई, 16 जनवरी (भाषा) देश के सबसे अमीर नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के हुए चुनावों के शुक्रवार को सामने आए नतीजों एवं रुझानों में कांग्रेस 227 में से महज 15 सीट पर बढ़त बनाती नजर आ रही है और विश्लेषक इसे शहरी क्षेत्र में देश की सबसे पुरानी पार्टी के पतन के एक और अध्याय के तौर पर देख रहे हैं।

बीएमसी चुनाव में पार्टी ने 152 सीटों पर चुनाव लड़ा था जबकि बाकी सीट उसने अपने सहयोगी वंचित बहुजन आघाडी (वीबीए), राष्ट्रीय समाज पक्ष और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (गवई गुट) के लिए छोड़ दी थीं।

कांग्रेस ने 2017 में जब बीएमसी के पिछले चुनाव में 31 सीट पर जीत दर्ज की थी।

मतगणना के रुझानों से संकेत मिलता है कि प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वीबीए, आरएसपी और आरपीआई (गवई) के साथ गठबंधन से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ। विश्लेषकों ने इसे वोट बढ़ाने वाला कदम मानने के बजाय एक रणनीतिक गलती करार दिया है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का गठबंधन उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उबाठा) से बीएमसी की सत्ता छीनने की ओर अग्रसर है। वहीं, कांग्रेस हाशिए पर सिमटती नजर आ रही है।

इन अहम चुनावों से पहले, कांग्रेस ने विपक्षी महा विकास आघाडी (एमवीए) के घटकों शिवसेना(उबाठा) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के साथ गठबंधन न करने का फैसला किया। उसे आशंका थी कि शिवसेना(उबाठा)और राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के हाथ मिलाने से उसका उत्तर भारतीय और अल्पसंख्यक वोट बैंक उससे दूर जा सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा, लेकिन लगता है कि यह रणनीति विफल हो गई है।

विश्लेषकों के मुताबिक इस रणनीति से कांग्रेस को उम्मीद के विपरीत दोहरा झटका लगा। एक ओर भाजपा ने गैर-मराठी हिंदू वोटों को आक्रामक रूप से एकजुट किया, जबकि शिवसेना(उबाठा)-मनसे ने भाजपा विरोधी मतों का अहम हिस्सा खुद से जोड़े रखने में सफलता पाई। इस स्थिति में कांग्रेस बीच में फंसी हुई प्रतीत हो रही है।

पारंपरिक रूप से शहर के कई हिस्सों को कांग्रेस का गढ़ माना जाता था लेकिन भाषाई और धार्मिक ध्रुवीकरण और प्रति-ध्रुवीकरण के कारण कांग्रेस ने भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना दोनों के मुकाबले अपनी पकड़ खो दी।

राजनीतिक विश्लेषकों ने कांग्रेस की इस करारी हार का कारण लगातार चल रही आंतरिक कलह और एक समन्वित चुनावी रणनीति की कमी को भी बताया। भाजपा और ठाकरे परिवार के चचेरे भाइयों ने क्रमशः बुनियादी ढांचे और मराठी पहचान पर केंद्रित जोरदार चुनाव प्रचार किया, वहीं कांग्रेस एक ठोस मुद्दा तलाशने में संघर्ष करती नजर आई।

उनका कहना है कि कांग्रेस के लिए सबसे चिंताजनक बात उसके मुख्य मतदाता वर्ग में आया बदलाव है। प्रारंभिक आंकड़ों से मुस्लिम और दलित वोटों में महत्वपूर्ण विभाजन का संकेत मिलता है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (एआईएमआईएम), समाजवादी पार्टी और अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा ने कांग्रेस के पारंपरिक समर्थन आधार में सेंध लगाई है।

विश्लेषकों का कहना है कि इस परिणाम से नेतृत्व परिवर्तन की मांग का एक नया दौर शुरू होने की संभावना है। पार्टी का नेतृत्व वर्तमान में शहर में सांसद वर्षा गायकवाड कर रही हैं।

कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है जिसने कभी मुंबई को अपना महापौर दिया था। हालांकि, इस चुनाव में 15 सीट पर सिमट जाना न केवल एक चुनावी झटका है बल्कि शहरी क्षेत्रों में उसकी बढ़ती अप्रासंगिकता का संकेत भी है।

वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए ) के साथ गठबंधन से कांग्रेस को दलित वोटों के एकजुट होने की उम्मीद थी, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के पास मतों के हंस्तांतरण के लिए जरूरी बूथ-स्तरीय ढांचा और संसाधन नहीं थे।

भाषा धीरज पवनेश

पवनेश