मुंबई, 12 फरवरी (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने अमेरिकी उपन्यासकार एफ स्कॉट फिट्जगेराल्ड के उस कथन को उद्धृत करते हुए रेल दुर्घटना में घायल हुए नशे में धुत व्यक्ति की मुआवजे के लिए दाखिल अर्जी खारिज कर दी, जिसमें कहा गया है कि ‘‘पहले आप शराब पीते हैं, फिर वह शराब आपको और पीने के लिए प्रेरित करती है और फिर वह आपको अपने वश में कर लेती है।’’
न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने बुधवार को इस संबंध में आदेश पारित किया, जिसकी प्रति बृहस्पतिवार को उपलब्ध कराई गई। अदालत ने कहा कि शराब सब कुछ बर्बाद कर देती है।
अदालत ने एक व्यक्ति की ओर से दाखिल अपील रद्द कर दी, जिसमें उसने रेलवे प्लेटफॉर्म पर लगी चोटों के लिए मुआवजे से इनकार करने वाले रेलवे दावा न्यायाधिकरण के 2014 के आदेश को चुनौती दी थी।
इसमें कहा गया कि आवेदक को राहत नहीं दी जा सकती क्योंकि चोट नशे की हालत में किए गए कृत्य के कारण लगी थी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘‘शराब सब कुछ बर्बाद कर देती है। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, रिश्तों को तोड़ देती है, पारिवारिक विघटन, सामाजिक अक्षमता, करियर में बाधा उत्पन्न करती है और जीवनशैली पर गंभीर दीर्घकालिक परिणाम डालती है।’’
न्यायमूर्ति जैन ने कहा, ‘‘मुझे एफ. स्कॉट फिट्जगेराल्ड का यह कथन याद आ रहा है जिसमें कहा गया है कि ‘पहले आप शराब का एक घूंट पीते हैं, फिर घूंट एक और घूंट के लिए प्रेरित करता है, और फिर घूंट आपको अपने वश में कर लेता है।’’
बॉम्बे अस्पताल में एक प्रयोगशाला सहायक के रूप में कार्यरत याचिकाकर्ता ने दावा किया कि 10 मार्च, 2001 की आधी रात के आसपास, वह मरीन लाइन्स स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था, तभी एक आती हुई ट्रेन ने उसे टक्कर मार दी।
उसे पहले जीटी अस्पताल ले जाया गया और बाद में बॉम्बे अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया। घटना के समय उसने भारी मात्रा में शराब पी रखी थी।
उच्च न्यायालय के आदेश में कहा गया है कि इस घटना को ‘‘अवांछनीय’’ नहीं माना जा सकता और इसलिए मुआवजे के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
पीठ ने कहा, ‘‘जब कोई व्यक्ति अत्यधिक नशे में हो, तो प्लेटफार्म की सीमा के पास खड़े होने का उसका कृत्य रेलवे अधिनियम की धारा 124ए के अंतर्गत आता है, जो नशे में धुत व्यक्ति को मुआवजा देने के उत्तरदायित्व से मुक्त करता है।’’
भाषा धीरज संतोष
संतोष