युद्ध के खतरे से घिरी दुनिया में केवल संवाद ही समाधान का रास्ता है: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

युद्ध के खतरे से घिरी दुनिया में केवल संवाद ही समाधान का रास्ता है: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

युद्ध के खतरे से घिरी दुनिया में केवल संवाद ही समाधान का रास्ता है: उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन
Modified Date: March 21, 2026 / 01:57 pm IST
Published Date: March 21, 2026 1:57 pm IST

नागपुर, 21 मार्च (भाषा) उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने शनिवार को कहा कि दुनिया युद्ध के खतरे से जूझ रही है और केवल संवाद से ही समाधान निकल सकता है।

राधाकृष्णन ने यहां रेशिमबाग स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के डॉ. हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर में भारतीय युवा संसद के 29वें राष्ट्रीय सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि अपनी मातृभाषा में बोलना क्षेत्रीय होने का नहीं, बल्कि मौलिक होने का प्रतीक है।

इस चार दिवसीय युवा संसद की विषय वस्तु ‘भारतीय भाषाएं और विकसित भारत-2047’ है।

उन्होंने कहा, ‘‘जब पूरी दुनिया युद्ध के खतरे से घिरी है, तब केवल संवाद ही समाधान का रास्ता दिखा सकता है। युवा संसद हमें सम्मानजनक तरीके से चर्चा करने, विविध दृष्टिकोणों को सुनने और संवाद के माध्यम से समाधान खोजने का महत्व सिखाती है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘(युवा संसद की) विषय वस्तु भाषा पर आधारित होना समय की आवश्यकता है। भारत में अनेक भाषाएं हैं। हर व्यक्ति अपनी मां से प्रेम करता है, हर व्यक्ति अपनी मातृभाषा और अपने धर्म से प्रेम करता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हमें दूसरे व्यक्ति की मां का सम्मान नहीं करना चाहिए। जब हम अपनी मातृभाषाओं में बोलते हैं, तब हम क्षेत्रीय नहीं बल्कि मौलिक होते हैं।’’

उपराष्ट्रपति ने कहा कि हर भाषा अपनी अलग विरासत समेटे हुए है, लेकिन ये सभी मिलकर सांस्कृतिक समरसता का निर्माण करती हैं जो भारत की पहचान है।

उन्होंने कहा, ‘‘भारत माता से बड़ा कोई भगवान नहीं है।’’

राधाकृष्णन ने कहा कि उन्होंने हाल में संविधान का अद्यतन अनुवादित संस्करण तमिल और गुजराती में जारी किया और इसे इतनी भाषाओं में उपलब्ध कराने की पहल के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की।

उन्होंने कहा, ‘‘संविधान पहली बार डोगरी, संथाली और कई अन्य भाषाओं में उपलब्ध कराया गया है। भारत की भाषाई विविधता के संरक्षण और संवर्धन के लिए केंद्र सरकार कई प्रयास कर रही है।’’

राज्यसभा के सभापति राधाकृष्णन ने संसद के जारी बजट सत्र पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सदन में रचनात्मक चर्चा देखकर उन्हें खुशी हुई।

उन्होंने कहा, ‘‘हमारी राय अलग-अलग हो सकती है लेकिन उसका उद्देश्य टकराव नहीं बल्कि अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचना और समाधान हासिल करना है। अंतिम उद्देश्य संवाद को निष्कर्ष तक पहुंचाना है। इस प्रकार की सार्थक चर्चा और संवाद हमें विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने में मदद कर सकते हैं। यह प्रत्येक सांसद का कर्तव्य है।’’

उपराष्ट्रपति ने कहा कि युवा संसद में भाग लेने वालों को इस मंच का इस्तेमाल उन मूल्यों को सीखने के लिए करना चाहिए जो एक जीवंत और मजबूत राष्ट्र का निर्माण करते हैं। उन्होंने इसमें भाग ले रहे विद्यार्थियों से कहा, ‘‘दुनिया भारत को गंभीरता से देख रही है। भारत भी उन्हें देख रहा है।’’

उन्होंने कहा कि वे ‘‘अमृत पीढ़ी’’ हैं जो 2047 तक पूर्ण विकसित राष्ट्र में तिरंगे को ऊंचा लहराते देखेंगे। राधाकृष्णन ने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य उधार के विचारों से हासिल नहीं किया जा सकता।

उन्होंने युवा संसद में भाग लेने वालों से कहा, ‘‘हमें अपनी जड़ों से नवोन्मेष करना होगा, हमें अपनी लिपियों में सोचना होगा और अपनी पहचान को लेकर आत्मविश्वास के साथ दुनिया का नेतृत्व करना होगा।’’

भाषा सिम्मी अमित

अमित


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