तारपा वादक भीक्ल्या लड़क्या ढिंडा पद्मश्री को ईश्वर का आशीर्वाद मानते हैं
तारपा वादक भीक्ल्या लड़क्या ढिंडा पद्मश्री को ईश्वर का आशीर्वाद मानते हैं
पालघर (महाराष्ट्र), 25 जनवरी (भाषा) पद्मश्री पुरस्कार के ‘गुमनाम नायकों’ की श्रेणी में नामित आदिवासी वाद्य यंत्र वादक भीक्ल्या लड़क्या ढिंडा ने इस सम्मान को ईश्वर का आशीर्वाद बताते हुए कहा कि वह दस साल की उम्र से ही संगीत के माध्यम से पूजा करते आ रहे हैं।
इस घोषणा से पालघर में, विशेषकर आदिवासी समुदायों में, उत्सव की लहर दौड़ गई। वे इस सम्मान को न केवल एक व्यक्ति को, बल्कि संपूर्ण सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान मानते हैं।
तारपा कला के बेहतरीन प्रतिपादकों में से एक माने जाने वाले 90 वर्षीय ढिंडा के लिए यह पुरस्कार परंपरा की सेवा में व्यतीत उनके श्रम का परिणाम है।
तारपा (लौकी और बांस से बना एक वाद्य यंत्र) के सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादकों में से एक माने जाने वाले ढिंडा ने कहा कि यह सम्मान परंपरा के प्रति समर्पण के माध्यम से अर्जित एक आशीर्वाद है।
उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘‘मैंने अपनी संस्कृति को संरक्षित रखा है और अपने संगीत के माध्यम से ईश्वर की आराधना की है। मैं 10 साल की उम्र से ही तारपा बजा रहा हूं। यह 400 साल पुरानी पारिवारिक परंपरा है। इसीलिए ईश्वर ने मुझे इस पुरस्कार से नवाज़ा है।’’
महाराष्ट्र के कई हिस्सों में ढिंडा की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया है, जिससे उन्हें आदिवासी कला के संरक्षक के रूप में पहचान मिली है।
उन्होंने कहा, ‘‘हम गरीब हैं, लेकिन हमारी संस्कृति ही हमारी असली दौलत है। मेरे परिवार में 22 सदस्य हैं। मेरा कोई और पेशा नहीं है। थोड़ी-बहुत खेती और तारपा के वाद्य यंत्र बनाना ही हमारी आजीविका का साधन है।
उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र सरकार से पहले मिले एक पुरस्कार की मदद से उन्होंने अपने परिवार के लिए एक छोटी सी झोपड़ी का निर्माण किया।
भाषा राजकुमार नरेश
नरेश


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