(Jagannath Puri Rath Yatra/ Image Credit: AI-generated)
पुरी: Jagannath Puri Rath Yatra: ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर हिंदू धर्म के चार पवित्र धामों में से एक माना जाता है। यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि अपनी अनोखी परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के लिए भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। साल 2026 में भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक चलेगी जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होंगे। मंदिर से जुड़े कई रहस्य आज भी लोगों के लिए आकर्षण का विषय है।
जगन्नाथ मंदिर को लेकर सबसे चर्चित मान्यता है कि मंदिर के मुख्य शिखर के ऊपर से पक्षी उड़ते हुए नजर नहीं आते। आमतौर पर ऊंची इमारतों के ऊपर पक्षियों का उड़ना सामान्य है। लेकिन इस मंदिर को लेकर यह बात लोगों को हैरान करती है। हालांकि इसके पीछे वैज्ञानिक कारणों को लेकर अलग-अलग विचार मौजूद हैं।
मंदिर के शिखर पर लगा ध्वज रोज बदला जाता है। मान्यता है कि यह ध्वज हवा की दिशा के विपरीत लहराता है। श्रद्धालु इसे भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा मानते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और मंदिर के सबसे अनोखे रहस्यों में शामिल है।
मंदिर के ऊपर स्थापित सुदर्शन चक्र को लेकर भी कई मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि इसे किसी भी दिशा से देखने पर यह हमेशा सामने की ओर दिखाई देता है। इसकी विशाल बनावट और स्थापना आज भी लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बनी हुई है।
लोकमान्याता के अनुसार जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से विमान नहीं उड़ते। कुछ लोग इसे धार्मिक कारणों से जोड़ते हैं जबकि कुछ इसे सुरक्षा नियमों और तकनीकी कारणों से समझाते हैं। मंदिर का नीलचक्र भी इस चर्चा का हिस्सा रहा है।
जगन्नाथ मंदिर की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में गिनी जाती है। यहां मिट्टी के बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर खाना पकाया जाता है। मान्यता है कि सबसे ऊपर रखा बर्तन पहले पक जाता है जो लोगों के लिए आश्चर्य की बात है।
मंदिर में रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालु महाप्रसाद ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि भक्तों की संख्या कितनी भी हो महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता। इसे भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद माना जाता है।
कई श्रद्धालुओं का मानना है कि मंदिर के मुख्य शिखर की स्पष्ट छाया दिखाई नहीं देती। इस बात को लेकर अलग-अलग मत हैं लेकिन यह मान्यता लंबे समय से लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
जगन्नाथ मंदिर में रोज ध्वज बदलने की परंपरा निभाई जाती है। सेवायत बिना आधुनिक सुरक्षा उपकरणों के ऊंचे शिखर पर चढ़कर यह कार्य करते हैं। यह परंपरा कई वर्षों से लगातार जारी है।
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियां नीम की पवित्र लकड़ी से बनाई जाती हैं। विशेष धार्मिक संयोग बनने पर 12 से 19 साल के अंतराल में नवकलेवर की प्रक्रिया होती है। जिसमें नई मूर्तियों की स्थापना की जाती है।
मंदिर से जुड़ी सबसे रहस्यमयी मान्यता ब्रह्म तत्व को लेकर है। कहा जाता है कि नवकलेवर के समय यह दिव्य तत्व पुरानी मूर्तियों से नई मूर्तियों में स्थानांतरित किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया बेहद गोपनीय रखी जाती है और इसी वजह से मंदिर का रहस्य और भी बढ़ जाता है।