Mahashivratri 2026: समुद्र मंथन से आगे की कहानी… दक्ष के श्राप ने कैसे चंद्रमा को पहुंचाया शिव के सिर तक?
Mahashivratri 2026: समुद्र मंथन के दौरान विष पीने से शिव के शरीर में तीव्र गर्मी बढ़ गई, जिसे शांत करने के लिए उन्होंने चंद्रमा को अपने माथे पर धारण किया। लेकिन एक और कारण भी है—प्रजापति दक्ष ने चंद्रदेव को श्राप दिया था, जिससे मुक्ति दिलाने के लिए शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर स्थान दिया।
(Mahashivratri 2026/ Image Credit: Pexels)
- महाशिवरात्रि 15 फरवरी को श्रद्धा और व्रत के साथ मनाई जाएगी।
- शिव के मस्तक पर चंद्रमा शीतलता और करुणा का प्रतीक है।
- समुद्र मंथन के विष को शांत करने के लिए चंद्रमा धारण किया गया।
Moon On Shiv Head: सनातन धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव और कालों के काल महाकाल कहा जाता है। महाशिवरात्रि उनका सबसे बड़ा और पवित्र पर्व है। यह हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है। इस वर्ष महाशिवरात्रि 15 फरवरी को मनाई जाएगी। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और पूरे श्रद्धा भाव से पूजा-अर्चना करते हैं। शिव जी के प्रमुख प्रतीकों में त्रिशूल, नाग और चंद्रमा शामिल है।
शिव के मस्तक पर चंद्रमा का रहस्य
भगवान शिव के माथे पर सुशोभित चंद्रमा उनके दिव्य स्वरूप को और भी अलौकिक बनाता है। सामान्य मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को पीने से शिव के शरीर में अत्यधिक गर्मी बढ़ गई थी। उस ताप को शांत करने के लिए उन्होंने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया, जिससे उन्हें शीतलता मिलती रहे।
प्रजापति दक्ष का श्राप
लेकिन पौराणिक कथाओं में एक और कारण बताया गया है। मान्यता के अनुसार, चंद्रमा का विवाह प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियों से हुआ था, जिन्हें ज्योतिष में 27 नक्षत्र कहा जाता है। चंद्रमा को अपनी पत्नी रोहिणी से विशेष प्रेम था। इससे अन्य पत्नियां उपेक्षित महसूस करने लगीं और उन्होंने अपने पिता दक्ष से शिकायत की।
श्राप और संकट की शुरुआत
अपनी बेटियों का दुःख देखकर प्रजापति दक्ष क्रोधित हो गए। उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि उनका तेज धीरे-धीरे क्षीण हो जाएगा और वे समाप्त हो जाएंगे। इस श्राप से चंद्रदेव भयभीत हो गए और उन्होंने भगवान शिव की शरण ली। उन्होंने कठोर तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया।
शिव की कृपा और चंद्रमा का स्थान
भगवान शिव चंद्रदेव की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें जीवनदान दिया। साथ ही, उनके सम्मान की रक्षा के लिए अपने मस्तक पर स्थान दिया। यही कारण माना जाता है कि चंद्रमा 15 दिन घटता है और 15 दिन बढ़ता है। इस प्रकार शिव के माथे पर चंद्रमा केवल शीतलता का प्रतीक ही नहीं, बल्कि करुणा और संरक्षण का भी प्रतीक है।
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