Sabai Grass Baskets: सबई घास से बने ये आकर्षक उत्पाद आपको दिला सकते हैं प्लास्टिक से मुक्ति, दाम भी बेहद कम और दिखने में भी खूबसूरत

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Sabai Grass Baskets: सबई घास से बने ये आकर्षक उत्पाद आपको दिला सकते हैं प्लास्टिक से मुक्ति, दाम भी बेहद कम और दिखने में भी खूबसूरत

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  • Publish Date - February 5, 2026 / 09:51 AM IST,
    Updated On - February 5, 2026 / 09:52 AM IST

Sabai Grass Baskets: सबई घास से बने ये आकर्षक उत्पाद आपको दिला सकते हैं प्लास्टिक से मुक्ति, दाम भी बेहद कम और दिखने में भी खूबसूरत / Image: CG DPR

HIGHLIGHTS
  • सबई घास से बनी रस्सियाँ और उत्पाद पूरी तरह ईको-फ्रेंडली
  • प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग को कम करने में मदद कर रहे
  • महिलाओं को नियमित मजदूरी मिलती है

रायगढ़: Sabai Grass Baskets ग्रामीण अंचलों में आजीविका के सीमित साधनों के बीच जब स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक दृष्टिकोण से जोड़ा जाता है, तब सफलता की नई इबारत लिखी जाती है। ऐसी ही एक प्रेरक कहानी है धर्मजयगढ़ वनमंडल अंतर्गत वनधन विकास केंद्र केड़ना की, जहाँ सबई घास से रस्सी निर्माण ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाया है।

सबई घास बना आजीविका का जरिया

Sabai Grass Baskets वन विभाग की अधिकारियों ने आज यहां बताया कि सबई घास रायगढ़ जिले के वन क्षेत्रोंकृजमझोर, केड़ना, सोलमुड़ा, सोरझुड़ा, अन्नोला एवं पेलमाकृमें प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में पाई जाती है। पारंपरिक रूप से ग्रामीण महिलाएं इससे हाथ से रस्सी बनाकर घरेलू उपयोग या स्थानीय बाजारों में सीमित स्तर पर बिक्री करती थीं। हालांकि, बाजार तक सीधी पहुंच और उचित मूल्य न मिलने के कारण यह कार्य बड़े पैमाने पर आय का साधन नहीं बन पा रहा था।

महिलाओं को मिला रोजगार

इसी कड़ी में राज्य सरकार की वनधन योजना के अंतर्गत वनधन विकास केंद्र केड़ना की स्थापना कर महिलाओं को स्व-सहायता समूहों के माध्यम से संगठित किया गया। उन्हें सबई घास से रस्सी निर्माण के लिए हाथों एवं विद्युत चालित मशीनें उपलब्ध कराई गईं। स्तर ही व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया। इससे महिलाओं की उत्पादन क्षमता बढ़ी और गुणवत्ता में भी सुधार हुआ।

1.5 से 2 लाख रुपए तक आमदनी

दरअसल सबई घास से निर्मित रस्सी का उपयोग बांस के बंडलों को बांधने में किया जाता है, जिसकी मांग वन विभाग एवं पेपर उद्योग में लगातार बनी रहती है। वन विभाग द्वारा सबई रस्सी को 45 रुपये प्रति किलो की दर से क्रय किया जाता है, जिससे महिलाओं को मजदूरी के रूप में नियमित आय प्राप्त हो रही है। वहीं तैयार रस्सी को विभिन्न वनमंडलों में 75 रुपये प्रति किलो की दर से विक्रय कर वनधन केंद्र को भी लाभ मिल रहा है। अधिकारियों ने बताया कि पिछले वर्षों में वनधन केंद्र केड़ना से जुड़ी महिलाओं ने 30 से 40 क्विंटल रस्सी का निर्माण कर 1.5 से 2 लाख रुपये तक की आय अर्जित की।

7 से 8 लाख रुपए कमाई का टारगेट

वर्ष 2025-26 में 150 क्विंटल रस्सी निर्माण का लक्ष्य रखा गया है, जिससे लगभग 7 से 8 लाख रुपये की आय ग्रामीण महिलाओं को होने की संभावना है। मार्च 2026 तक कुल 11.25 लाख रुपये मूल्य की रस्सी निर्माण कर 7.50 लाख रुपये मजदूरी के रूप में ग्रामीणों को प्राप्त होने का अनुमान है। यह परियोजना पूरी तरह ईको-फ्रेंडली है। सबई घास का विनाश रहित दोहन किया जाता है, जिससे वन संरक्षण और पर्यावरण संतुलन बना रहता है। भविष्य में भू-क्षरण प्रभावित क्षेत्रों में सबई घास रोपण की योजना भी प्रस्तावित है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार के अवसर और बढ़ेंगे।

महिलाओं के जीवन की नई उम्मीद

वनधन विकास केंद्र केड़ना की यह पहल इस बात का सशक्त उदाहरण है कि यदि स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक और संगठित उपयोग किया जाए, तो ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भर बन सकती हैं। सबई घास से रस्सी निर्माण ने न केवल रोजगार सृजन किया है, बल्कि महिलाओं में आत्मविश्वास, आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन की नई उम्मीद भी जगाई है।

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सबई घास से बनी रस्सी का मुख्य उपयोग क्या है?

इसका सबसे अधिक उपयोग बांस के बंडलों को बांधने के लिए वन विभाग और पेपर मिलों में किया जाता है। इसके अलावा इससे सजावटी सामान और मैट भी बनाए जाते हैं।

वनधन विकास केंद्र केड़ना से कितनी महिलाएं जुड़ी हैं?

इस केंद्र से क्षेत्र के विभिन्न स्व-सहायता समूहों की दर्जनों ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हैं, जिन्हें अब स्थानीय स्तर पर ही सम्मानजनक रोजगार मिल रहा है।

क्या सबई घास पर्यावरण के लिए फायदेमंद है?

जी हाँ, यह परियोजना 'विनाश रहित दोहन' पर आधारित है। साथ ही, भविष्य में भू-क्षरण (Soil Erosion) रोकने के लिए भी सबई घास का रोपण करने की योजना है।

एक ग्रामीण महिला इस काम से औसतन कितना कमा लेती है?

उत्पादन के आधार पर समूह की महिलाएं सालाना ₹1.5 लाख से ₹2 लाख तक की सामूहिक आय अर्जित कर रही हैं, जो सीधे उनके आर्थिक सशक्तिकरण में मदद कर रहा है।

क्या आम लोग इन उत्पादों को खरीद सकते हैं?

हाँ, छत्तीसगढ़ के 'संजीवनी' केंद्रों और स्थानीय वनधन केंद्रों के माध्यम से इन ईको-फ्रेंडली उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा दिया जा रहा है।